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सीतापुर जिला पंचायत के 174 टेंडर निरस्त

Thu, 01 Sep 2016 11:17 PM IST
Amarujala Bureau
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- फोटो : amar ujala
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सीतापुर जिला पंचायत के कामों पर सवालिया निशान लगाते हुए इसे निरंकुश और आंखों में धूूल झोंकने वाला करार दिया। जिला पंचायत ने पहले तो बिना समितियों और उस समितियों में चर्चा किए विकास कार्यों के टेंडर निकाले, जब अदालत में चुनौती दी गई तो उसे वापस ले लिया लेकिन फिर आनन-फानन में समितियां बनाकर 23 जुलाई को महज 90 मिनट में 174 विकास कार्यों पर फैसले ले लिए।
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इसके लिए 8 अगस्त और 13 अगस्त को बाकायदा टेंडर भी निकाल दिए गए। जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस डॉ. विजय लक्ष्मी ने इसे गलत मानते हुए सभी टेंडर और फैसले रद्द कर दिए। जिला पंचायत सदस्य सरोजिनी देवी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 8 अगस्त 2016 को निकाले गए टेंडर नोटिस को खारिज करने की मांग की थी।

उनका कहना था कि फरवरी में भी जिला पंचायत ने बिना किसी कमेटी में चर्चा किए इसी तरह के टेंडर निकाले थे लेकिन इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका की गई तो इन्हें वापस ले लिया। लेकिन अप्रैल में फिर से निकाल दिया। इसके खिलाफ सिर्फ से याचिका की गई।
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इस याचिका पर हाईकोर्ट ने निर्देश दिए कि टेंडर जारी रह सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसला याचिका पर निर्णय के बाद ही किया जा सकेगा। जिला पंचायत ने इन टेंडरों को फिर से वापस ले लिया। इस दफा उसने 13 जुलाई 2016 को खुद ही पंचायत सदस्यों की बैठक बुलाई और एजेंडा बंटवाया। पंचायत सदस्यों को बताया गया कि 23 जुलाई को कमेटी बनाने के लिए बैठक करवाई जाएगी।

यह बैठक हुई और उसी दिन कमेटी बनाई गई। इसे प्लानिंग एंड डवलपमेंट कमेटी नाम दिया गया। 23 जुलाई को ही इस नई कमेटी ने दोपहर ढाई बजे बैठक की जिसमें 13वें वित्त आयोग से मिली राशि को खर्च करने पर विचार किया जाना था। इसके लिए पंचायत सदस्यों के प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए इन्हें आधार बनाया जाना था और यहां आए प्रोजेक्ट्स को फाइनल करना था।

इस तरह चार बजे तक चली इस बैठक में आए 174 प्रस्तावों को मंजूरी दे दी गई। याचिकाकर्ता का कहना था कि 90 मिनट में 174 प्रोजेक्ट्स को पास करते हुए एक प्रोजेक्ट पर आधा मिनट भी चर्चा नहीं की गई। पूरी प्रक्रिया कागजी और औपचारिकता भर थी।

इसी बैठक के बाद आठ और 13 अगस्त को टेंडर निकाल दिए गए। दूसरी ओर याचिका में पंचायत व अध्यक्ष द्वारा कमेटी के गठन को भी गलत बताया गया और कहा गया कि इसमें जिला पंचायत सदस्यों को शामिल नहीं किया गया। वहीं सब कमेटियों का गठन भी नहीं किया गया, लेकिन उनका एजेंडा बंटवा दिया गया। अदालत ने कहा कि याचिका में कमेटियों के गठन को रद्द करने की मांग नहीं गई है।

ऐसे में हाईकोर्ट इसमें नहीं जाएगा और इस पर कमिश्नर को विचार करने केलिए कहा जा सकता है जिसके लिए नियमनों के अनुसार कमेटी बनने के छह हफ्ते में आपत्ति दाखिल करनी होती है।

जो कमेटी 23 जुलाई को बनी, उसका एजेंडा 13 को ही दे दिया
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि यह बात समझ से परे है कि कमेटी बनाने, 174 प्रोजेक्ट्स को पास करने जैसे कामों को सिर्फ डेढ़ घंटे में कैसे कर लिया गया। यह स्पष्ट तौर पर कागजी कार्यवाही है, जिसमें ठीक से विचार भी नहीं किया गया।

जबकि जो कमेटी 23 जुलाई को बनाई गई, उसका एजेंडा 13 जुलाई को ही पंचायत ने जारी कर दिया। यह जिला परिषद नियमावली 1962 के अनुसार नहीं है। नियमानुसार तीन दिन पहले कमेटी एजेंडा कमेटी द्वारा जारी होना चाहिए था, जो नहीं हुआ। बल्कि कमेटी बनने केे ढाई घंटे के भीतर इन प्रोजेक्ट्स पर निर्णय भी ले लिया गया।

निर्णय में कहा
हाईकोर्ट ने कहा कि कमेटी द्वारा आठ व 13 अगस्त को जारी किए गए टेंडर नोटिसों और कार्यवाहियों को रद्द किया जाता है। साथ ही कहा कि बनाई गई कमेटी प्रोजेक्ट्स और प्रस्तावों पर अपनी कार्यवाहियां नियमों के अनुसार जारी रख सकती है। हालांकि इन्हें अगर वरिष्ठ सत्ता या अदालतों में चुनौती दी जाती है तो वहां जाने वाले आगामी आदेशों के तहत माने जाएंगे। 
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