स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. सूरज प्रसाद श्रीवास्तव पंचतत्व में विलीन हो गए। शनिवार को लखीमपुर स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली।
वह 100 वर्ष के थे। पैतृक गांव बम्हौरा में रविवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। वाईडी कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं थीं।
कसमंडा के ग्राम बम्हौरा के एक साधारण परिवार में जन्मे सूरज प्रसाद श्रीवास्तव की प्रारंभिक शिक्षा कमलापुर में हुई। छात्र जीवन से ही वह आजादी की लड़ाई में सक्रिय हो गए थे। 1945 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आजादी के बाद लखीमपुर के वाईडी कॉलेज में उन्हें शिक्षक के पद पर नौकरी मिली।
इसी कॉलेज में वह प्राचार्य बने। नौकरी की वजह से 45 साल पहले वह अपना घर छोड़ लखीमपुर में बस गए थे। शुभचिंतकों ने बताया कि उनकी कोई संतान नहीं है। पत्नी का देहांत भी पहले ही हो चुका था। साहित्य के क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा।
रविवार को उनका पार्थिव शरीर पैतृक गांव बम्हौरा लाया गया। यहां राजकीय सम्मान के साथ गारद की सलामी देकर उन्हें अंतिम विदाई दी गई। इस मौके पर नायब तहसीलदार अंगद यादव, थानाध्यक्ष सूर्य प्रकाश शुक्ल, रामचंद्र मिशन के पदाधिकारियों सहित भारी संख्या में लोग मौजूद थे।