... सरकार ने इन्हें मृत घोषित कर दिया। मुआवजे की रकम भी मिल गई पर दिल अभी मानता नहीं है। आज भी दरवाजे की हर आहट पर ऐसा लगता मानो वह लौट आया हो। यह दर्द है उत्तराखंड त्रासदी में अपनों से बिछडे़ लोगों का। तीसरी बरसीं पर कइयों की आंखों नम हो गईं।
जून 2013 में आई केदारनाथ आपदा लाखों यात्रियों के दिलों दिमाग को आज भी झकझोर देती है, जो उस महाप्रलय के गवाह हैं। बिसवां क्षेत्र के भिनैनी गांव से किशोरी लाल (65), उनकी पत्नी सावित्री (63) और उनका पौत्र अभिषेक (14) घर से 6 जून 2013 को केदारनाथ के लिए निकले थे।
संजय बताते हैं, कि 16 जून की वह मनहूस घड़ी लाख कोशिश करने पर नहीं भूलती। बेटे अभिषेक ने मोबाइल से बात की थी। बताया था कि हालात बेहद खराब हैं। इसी बीच कॉल कट गई। उसके बाद न किसी से बात हुई और न वह लोग लौट कर घर आए। इंतजार आज भी है।
उत्तराखंड सरकार ने तीनों को मृत घोषित कर मुआवजा भी दे दिया है पर उनके लौट आने की उम्मीद दम नहीं तोड़ रही। मिश्रिख से धीरेंद्र त्रिपाठी, लालू, हिमांशु मिश्रा, व संतोष विश्वकर्मा केदारनाथ आपदा में ऐसा फंसे कि आज तक उनकी कोई खबर नहीं मिल सकी है।
धीरेंद्र के पिता वेद प्रकाश आज भी यकीन नहीं कर पा रहे हैं कि उनका लाल अब नहीं आएगा। बोले, उत्तराखंड सरकार ने कह दिया कि वह अब नहीं रहे। मुआवजा दे दिया, लेकिन हम कैसे यकीन कर लें। नम आंखों से वेद बोले, रात को घर की सांकल खटकती है, तो दिल धड़क उठता है कहीं धीरज तो नहीं आ गया।
रहस्यमयी कॉल की गुत्थी ने किया बेहाल
अधिवक्ता वेद प्रकाश के पास पिछले साल आई एक कॉल आई। एक महीने तक कॉल करने वाला इनकी उम्मीदें जगाकर भावनाओं से खेलता रहा, लेकिन कोई सार्थक नतीजा न निकलने पर उन्हें मायूस होना पड़ा। दरअसल, वेद के मोबाइल पर नवंबर 2015 में कॉल आई। कहा गया कि बेटा धीरज जिंदा है। कॉल करने वाला गोलमोल जवाब देता रहा पर उनके बेटे को जीवित होने की आस जगा दी। हरिद्वार में हर की पैड़ी पर धीरज के मिलने की बात कही। वह हर की पैड़ी गए लेकिन खाली हाथ लौटना पड़ा।
रास्ते में रुकने से चालक सकुशल लौट सका
मिश्रिख के धीरेंद्र्र व उनके साथियों की गाड़ी का चालक बबलू सकुशल लौट आया था। दरअसल, बबलू को रास्ते में गौरीकुंड के पास इसलिए रुकना पड़ा, क्योंकि गाड़ी आगे जा नहीं पा रही थी। धीरज व साथी पैदल आगे बढ़ गए, जबकि चालक बबलू गाड़ी पर रुक गया।