नैमिषारण्य/सीतापुर। नैमिषारण्य तीर्थ में शुक्रवार को आषाढ़ मास की अमावस्या का पर्व श्रद्धाभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने तीर्थ में स्नान ध्यान करके मां ललिता देवी सहित अन्य मठ मंदिरों के दर्शन किए।
आषाढ़ मास की अमावस्या को हलहारिणी अमावस्या भी कहा जाता है। मान्यता है कि आषाढ़ मास के अंत में ही वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। इस दिन पीपल, बरगद, नीम, आंवला, अशोक, तुलसी, बेल और अन्य पेड़-पौधे लगाने की परंपरा है। ग्रंथों में भी कहा गया है कि अमावस्या पर लगाए गए पेड़-पौधों से पितर और देवता प्रसन्न होते हैं। साथ ही कभी न खत्म होने वाला पुण्य भी मिलता है। इससे कई तरह के दोष भी खत्म होते हैं।
आषाढ़ की अमावस्या के दिन भगवान विष्णु की पूजा और पितरों का तर्पण किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिविधान से पूजा की जाती है। साथ ही पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध तर्पण भी किया जाता है। अमावस्या तिथि पर नाभि गया नैमिषारण्य तीर्थ के तहत गोमती व चक्रतीर्थ स्नान का विशेष महत्व होता है। तीर्थ में स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देकर पितरों का तर्पण किया जाता है।
शुक्रवार को आषाढ़ अमावस्या पर्व पर श्रद्धालुओं ने चक्रतीर्थ व गोमती नदी में स्नान व आचमन कर दान-पूजन किया। इसके बाद नगर के प्रमुख मंदिर ललिता देवी, व्यास गद्दी, हनुमानगढ़ी, सूत गद्दी, शौनक गद्दी, बाला जी मंदिर, कालीपीठ व सत्यनारायण सन्निधि आश्रम देवदेवेश्वर आदि मंदिरों में दर्शन-पूजन किया।