सीतापुर। ‘नागफनी जो उगा रहे हैं गमलों में गुलाब के बदले, शाखों पर उस श्रापित पीढ़ी का खंडित विश्वास लिखा है’। मरहूम शायर अदम गोंडवी की ये लाइनें कोनी गांव को कटान से बचाने के लिए बनाए गए बांस व पेड़ की डालों के 140 मीटर लंबे बांध पर सटीक बैठती हैं।
घाघरा की बेकाबू लहरें रोकने की गारंटी जहां स्टड भी नहीं हैं वहां बांस लगाकर लहरें काबू करने की दिखावटी कवायद की गई थी। नतीजतन, ये दिखावटी बांध दो दिन भी घाघरा की लहरें रोक नहीं पाया और पानी के तेज बहाव में बह गया।
कोनी को कटान से बचाने की सारी कवायद फेल होने के बाद एक बार फिर इस गांव के आशियाने घाघरा के निशाने पर आ गए हैं।
रविवार को जलस्तर घटने से कटान तेज हो गई है। खेती योग्य जमीनें धीरे-धीरे घाघरा में समाती जा रही हैं। तटीय क्षेत्र के बाशिंदे बाढ़ की आशंका से दहशत में हैं।
दरअसल, घाघरा का जलस्तर बढ़ने से पानी का तेज बहाव कोनी गांव के करीब पहुंच गया है। कटान का खतरा मंडराता देख कोनी निवासी जागेश्वर परिवार समेत गांव से पलायन कर खेत में ठिकाना बनाने को मजबूर हो गए हैं।
हालांकि घाघरा का जलस्तर थमने से कुछ दिन तक कटान का खतरा टल गया था। मगर दो-तीन दिन बाद पहाड़ों पर भारी बारिश और बैराजों से छोड़े गए लाखों क्यूसेक पानी से घाघरा फिर उफना गई है।
लिहाजा, कोनी गांव पर फिर से कटान का खतरा मंडराने लगा है। जिलाधिकारी अखिलेश तिवारी ने पिछले दिनों सिंचाई विभाग को कटान रोकने के निर्देश दिए थे।
इस पर सिंचाई विभाग ने 26 जुलाई को कोनी के सामने कटान रोकने के लिए बांस लगाकर उसमें पेड़ की डालें बंधवा दी थीं।
करीब 140 मीटर लंबा ये बांध दो दिन भी घाघरा के तेज बहाव के सामने नहीं टिक सका और पानी में बह गया। कोनी निवासी सदानंद व लालजी ने बताया कि कटान रोकने का महज दिखावा भर किया गया है।
वास्तव में यदि कटान रोकनी होती तो प्लास्टिक की बोरी में बालू भरकर स्टड की तरह लगवाई जाती। रामनिवास व पैकरमा का कहना है बांस तो नदी में समा गए, अब जलस्तर थमने से कटान तेज हो गई है। ऐसे में कटान का खतरा मंडराने से गांव वालों की रातें जागकर कट रही हैं।
घाघरा का जलस्तर घटने से रविवार को कटान शुरू हो गई। फौजदार पुरवा में रहने वाले पटवारी की एक बीघा, कम्पोटर की डेढ़ बीघा व पहलवान की एक बीघा जमीन नदी में समा गई है।
वहीं, निर्मल पुरवा के रामनरेश, दिनेश व संतोष की दो-दो बीघा जमीन घाघरा में समा गई है। इस तरह कुल 20 बीघा खेत नदी में समा गए हैं।
मारूबेहड़ से बसंतापुर होते हुए गौलोक कोडर जाने वाली सड़क के किनारे जगह-जगह रेनकट से गड्ढे हो गए हैं। इससे हादसे के साथ ही सड़क क्षतिग्रस्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
बाढ़ आने पर इसी सड़क से प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुंचाई जाती है। सड़क को नुकसान हुआ तो बाढ़ आने पर प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुंचाना भी आसान नहीं होगा।
एसडीएम बिसवां शिशिर कुमार का कहना है कि कोनी के पास कटान की रोकथाम के लिए लगाए गए बांस पानी में बहने के मामले की जांच कराई जाएगी।
कोनी के ग्रामीणों को दूसरी जगह बसाने के लिए जमीन मुहैया कराने को लेकर उच्चाधिकारियों से बात की जाएगी। जैसे निर्देश मिलेंगे, उसी के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी।