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फैलने लगा संक्रामक रोग, डायरिया से बच्चे की मौत

Thu, 11 Aug 2016 11:11 PM IST
Amarujala Bureau
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घाघरा में कटान तेज - फोटो : अमर उजाला
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बाढ़ग्रस्त इलाके में संक्रामक बीमारियों का कहर शुरू हो गया है। रेउसा में गुरुवार को डायरिया की चपेट में आकर एक बालक की मौत हो गई। आसपास के गांवों के दर्जनों लोग बीमार हैं। बाढ़ पीड़ितों की समस्या यह है कि वे एक वक्त के भोजन का इंतजाम करें, जान बचाएं या फिर इलाज कराएं। करीब एक माह से लोग बाढ़ का दंश झेल रहे हैं। गुरुवार को फिर से घाघरा व शारदा नदी में ढाई लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया। 
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बाढ़ प्रभावित रेउसा क्षेत्र में ग्राम डेलिया निवासी विजय के पुत्र जितिन (1.5) को बुधवार को उल्टी-दस्त आने लगे। परिवार के सदस्य बाढ़ के पानी को पार कर रेउसा कस्बा पहुंचे। यहां पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर को दिखाया। परिवारीजनों के मुताबिक डॉक्टर ने डायरिया की पुष्टि की और दवा देकर घर भेज दिया।

परिवार के सदस्य बच्चे को घर ले आए। यहां देर शाम उसकी मौत हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ग्रस्त इलाके में स्वच्छ पानी नसीब नहीं हो रहा है। लोग दूषित पानी पीने को विवश हैं। क्षेत्र में करीब 60 गांव बाढ़ की चपेट में हैं। लोगों को बुखार व उल्टी दस्त की शिकायतें हैं। करीब 20 गांव ऐसे हैं जो बुरी तरह से बाढ़ के पानी की चपेट में हैं।
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इन गांवों से बाहर निकलना मुसीबत मोल लेने के बराबर है। इलाज करा पाना तो दूर की बात है। उधर, घाघरा के टापू पर बसे पचीसा गांव में बाढ़ का पानी बढ़ रहा है। यहां  पर घाघरा कटान कर रही है। दुर्गा पुरवा गांव के निकट सड़क कटने से बाढ़ का पानी गांव की तरफ बढ़ रहा है। कोनी गांव पहले से ही बाढ़ की चपेट में है। शारदा व घाघरा बैराजों से 250053 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। इससे बाढ़ग्रस्त इलाके के जलस्तर में और इजाफा होने की संभावना है।

अंतिम संस्कार में आती दिक्कत
बाढ़ग्रस्त इलाके में शवों के अंतिम संस्कार में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मरेली गांव निवासी दैलू (60) की बुधवार को मौत हो गई। परिवार के सदस्यों का कहना था कि वह बीमार था, लेकिन बाढ़ से गांव घिरा हुआ है। जिस कारण उसे इलाज के लिए कहीं नहीं ले जा सके।

नतीजतन घर पर ही दैलू ने दम तोड़ दिया। गुरुवार को जब शव की अंत्येष्टि का समय आया, तो परिवार को सूखी जमीन तलाशना मुश्किल हो गया। ऐसे में खेत में ही शव का अंतिम संस्कार किया गया। शव को गांव से खेत तक पहुंचाने में भी ग्रामीणों को बाढ़ का सामना करना पड़ा।

रात काटना होता मुश्किल 
बाढ़ से रास्ता व खेत तथा नाले कुछ भी नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में कदम-कदम पर खतरा बना हुआ है। दिन तो जैसे तैसे कट जाता है, लेकिन रात का समय कटना मुश्किल हो जाता है। चारपाई व तख्त के पाये पानी में समाए हुए हैं।

ऐसे में यह भी खतरा बना रहता है कि न जाने किस समय सैलाब का पानी एकदम बढ़ जाए। जिस कारण सोते समय ही उन पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़े। ये ही वजह है कि बाढ़ में फंसे परिवार रात में ठीक से नहीं सोते। घर का कोई न कोई सदस्य  पूरी रात जागकर पानी की स्थिति पर नजर रखता है। 
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