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शुरुआती रुझानों में बीजेपी पीछे, मतगणना जारी

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सीतापुर। पंचायत चुनाव को लेकर बीजेपी की मेहनत सफल होती नहीं दिख रही है। शुरुआती रुझानों में बीजेपी का हाल पश्चिम बंगाल जैसा दिख रहा है। कुछ सीटों को छोड़कर सभी पर बीजेपी पीछे चल रही है। बीजेपी ने जिले में जिला पंचायत की सभी 79 सीटों पर प्रत्याशियों को उतारा था। इनमें वार्ड संख्या 74 के बीजेपी उम्मीदवार शिवकुमार गुप्त आगे चल रहे थे। श्रद्धा सागर, नीरा देवी, पुष्पा देवी, भूपेंद्र मौर्य सहित कई उम्मीदवार पीछे चल रहे थे। उधर, मतगणना में निर्दलीय उम्मीदवार आगे चल रहे हैं।
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भारी के तैयारियों के बावजूद पंचायत चुनाव में भाजपा शुरुआत से लड़खड़ाने लगी थी। उम्मीदवारों के चयन में ही पार्टी में विद्रोह की स्थिति बन गई थी। 79 सीटों के लिए करीब 350 आवेदन आए थे। ज्यादातर आवेदन पार्टी के कार्यकर्ताओं के थे। टिकट न मिलने पर कार्यकर्ताओं ने बगावती तेवर अपना लिए थे। यहां तक 14 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ या तो खुद या फिर परिवारीजनों को चुनावी मैदान में उतार दिया था।
इससे नाराज प्रदेश कार्यालय ने बगावत करने वाले पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं को छह वर्षों के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इससे अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं में सकारात्मक संदेश नहीं गया था। सोशल मीडिया पर कार्यकर्ताओं ने टीस निकालनी शुरू कर दी थी और अंदर ही अंदर विरोध की ज्वाला भड़कने लगी थी। ऐसे में पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को विरोध बढ़ने लगा था। उन्हें अपनों का ही विरोध झेलना पड़ रहा था। इससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा।
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जिला प्रभारी राज्यसभा सांसद हरिद्वार दुबे, जिलाध्यक्ष अचिन मेहरोत्रा सहित पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं की भरपूर मेहनत के बावजूद पार्टी कुछ खास नहीं कर सकी। इसकी बानगी मतगणना के शुरुआती रुझानों में देखने को मिली। कुछ को छोड़कर बीजेपी लगभग सभी सीटों पर पीछे चल रही है। हालांकि, जिलाध्यक्ष अभी उम्मीदों से लबरेज हैं। रविवार शाम उन्होंने कहा कि अभी मतगणना का बड़ा हिस्सा बाकी है, उनकी पार्टी 15 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, अंतिम परिणाम पार्टी के पक्ष में रहेंगे।
जनता ने दिखाया आइना
पंचायत चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहे। स्थानीय नेता जनता को कोई खास काम नहीं दिखा सके। जनता ने उन्हें पंचायत चुनाव में आइना दिखा दिया। राजनीतिक जानकार बीजेपी के पिछड़ने में इसे मुख्य वजह बताते हैं। उनका कहना है कि बड़े चुनाव में मोदी के चेहरे पर वोट पड़ जाते हैं, लेकिन पंचायत चुनाव में लोग अपने करीबी को ही वोट देते हैं। पर स्थानीय नेता वैसा विश्वास नहीं जुटा पाए। कोरोना महामारी के चलते मची हाय तौबा भी पार्टी के पिछड़ने का कारण बनी है।
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