फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रणबांकुरों ने पाक को धूल चटाकर रच दी विजयगाथा

विज्ञापन
विज्ञापन
मोर्चे पर रात भर खड़ा रहा, नाले का पानी पीकर बुझानी पड़ी प्यास
विज्ञापन


सीतापुर। ...16 दिसंबर 1971 की सुबह। यह तारीख हर हिंदुस्तानी के लिए कुछ खास महत्व रखती है। कारण, आज के ही दिन भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज को धूल चटाई थी।

देश की सेना का पराक्रम पूरे विश्व में फैला था। भारत-पाक के बीच हुए युद्ध में हिंदुस्तान की सेना ने अद्भुत साहस व वीरता का परिचय देते हुए उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
विज्ञापन


देश के कई सपूत शहीद भी हुए लेकिन हमारे सैनिकों ने विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी। भारतीय सेना की जीत को सम्मान देने के लिए यह दिन हर साल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

1971 के युद्ध का हिस्सा रहे देश के जांबाज सैनिक आज भी जंग का वह दौर याद कर उत्साह से लबरेज हो जाते हैं। हालांकि साथियों की शहादत का मंजर याद आते ही उनकी आंखें भी नम हो जाती हैं।

भारत-पाक के बीच 3 दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 तक 13 दिन चली इस जंग में भारतीय सैनिकों के पराक्रम के आगे पाकिस्तानी फौज घुटने टेकने पर मजबूर हो गई थी।

भारतीय सेना के सामने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने समर्पण किया था। इस युद्ध में 3900 भारतीय जवान शहीद हुए थे और लगभग 10,000 जवान घायल हुए थे।

इस जंग के बाद भारत में 16 दिसंबर 1971 का दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह देश के लिए वह दिन है जिस पर हर भारतीय को गर्व महसूस होता रहेगा।

इस जंग का हिस्सा रहे सैनिकों के जेहन में आज भी साहस के वह 13 दिनों की यादें ताजा हैं। देश के वीर जवानों ने भूखे-प्यासे रहकर लड़ाई लड़ी और दुश्मन को धूल चटा दी।

जंग के दौरान कई बार मौत इनके बेहद करीब से गुजरी। वह बंधक भी बनाए गए। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। अपने देश की आन-बान और शान के लिए जान की बाजी लगाकर दुश्मनों से मोर्चा लेते रहे।

इनके पराक्रम के आगे आखिरकार दुश्मन ने आत्मसमर्पण कर दिया। इन सैनिकों की जिंदगी का 1971 की जंग अहम हिस्सा है। आज भी जंग का दौर याद कर इनकी भुजाएं फड़कने लगती हैं।

तीन दिन तक खाली पेट संभाला मोर्चा, फिर जूठी रोटी खाई
भारतीय फौज में क्वार्टर मास्टर के पद पर तैनात आरसी द्विवेदी के चेहरे पर 1971 की जंग का जिक्र होते ही जोश हिलोरे मारने लगता है।

वह बताते हैं, कि कमांडर आरबी राव के नेतृत्व में उनकी टुकड़ी पीरगंज से कुछ फासले पर मोर्चा संभाले थी। एकाएक भारी तादाद में दुश्मनों ने घेराबंदी कर उन्हें बंधक बना लिया।

बंधक बनने के बाद भी उनकी टुकड़ी ने हौसला नहीं हारा और मोर्चे पर डटे रहे। गोलियों की बौछार के बीच उनकी तोपखाने की बोरियां ढह रही थीं।

हम लोग दुश्मन के निशाने पर आते जा रहे थे। उनके कुछ साथी शहीद हो गए। तीन दिनों तक भूखे-प्यासे उनकी टुकड़ी के बचे सैनिक जिंदगी और मौत से जूझते रहे।

इसी बीच राजपूत रेजीमेंट की एक टुकड़ी उनकी मदद को पहुंची। दुश्मनों को मौत के घाट उतारने के बाद राजपूत रेजीमेंट उन लोगों को पीरगंज लेकर पहुंची।

वहां पहुंचते ही हमने खाना मांगा। इस पर एक जवान बोला पिछले 24 घंटे से सप्लाई ठप है। कुछ जूठी रोटियां पड़ी हैं। हमने उन्हीं जूठी रोटियों से अपना पेट भरा, जिसके बाद बेहोश हो गए।

गोलियों की बौछार के बीच रातभर संभाले रहा मोर्चा
थानगांव के ग्राम देवरिया में रहने वाले जसवंत सिंह 19 साल की उम्र में फौज में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। फौज में जाने के एक साल बाद 1971 में भारत-पाक की जंग छिड़ गई।

उस दौरान जसवंत की तैनाती बंगाल में खोलना नामक जगह पर थी। वह बताते हैं कि जंग में वह मोर्चा संभालते हुए अपनी जगह डटे थे। बाहर से किसी भी तरह की मदद नहीं पहुंच पा रही थी।

गोलियों की बौछार के बीच रात भर खड़े रहकर दुश्मन से मोर्चा लेते रहे। पूरी रात पानी की एक बूंद भी गले के नीचे नहीं उतरी थी। क्योंकि वहां पीने का पानी तक नहीं था।
विज्ञापन


रात भर प्यासे रहकर लड़ते हुए जब गला सूखने लगा तो नाले का गंदा पानी पीकर किसी तरह प्यास बुझाई। इस जंग में विजय हासिल करने के बाद तबादला राजस्थान हो गया था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें