रामपुर मथुरा (सीतापुर)। बाढ़ में अपना सब कुछ गंवाकर अंगरौरा-गनेशपुर तटबंध पर रह रहे सैकड़ों बेसहारा बाढ़-पीड़ितों के लिए ठंड मुसीबत बन चुकी है। पछुआ हवा से सर्द हुई रातें इन पर भारी पड़ रही हैं। इनका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। शासन-प्रशासन से बाढ़ के दौरान मिलने वाली फौरी मदद व आश्वासनों की घुट्टी भी इन्हें आर्थिक तंगी और भुखमरी से उबार नहीं पाई है। अब तक प्रशासनिक सहायता से महरूम लगभग 200 परिवार कड़ाके की ठंड में झुग्गी झोपड़ी और तिरपाल में रहने को विवश हैं।
बाढ़ आकर गुजर गई लेकिन सैलाब में घर व जमीन गंवाने वाले सैकड़ों परिवारों की दुश्वारियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। कड़ाके की ठंड में इन परिवारों की हकीकत जानने के लिए अमर उजाला टीम अंगरौरा-गनेशपुर तटबंध पर पहुंची। यहां अलाव के सहारे सर्दी से राहत पाने की मशक्कत कर रहे तमाम बच्चों में से एक-दो ही स्वेटर पहने हुए थे। तंगहाली में गुजर-बसर करने वाले इन परिवारों के अधिकतर बच्चे शर्ट-पैंट तो कुछ केवल बनियान और चड्ढी ही पहने हुए दिखाई दिए।
कड़ाके की ठंड में ठिठुर रहे सुनील ने बताया, पापा मजदूरी से जितना कमाते हैं उसी से गुजारा होता है। इस समय उन्हें मजदूरी नहीं मिल रही है। दूसरे बच्चे राकेश यादव ने बताया कि स्कूल से मिली ड्रेस के अलावा कोई अन्य कपड़ा नहीं है। पापा ने बताया कि किसान निधि का पैसा आने वाला है, उसी से कपड़े खरीदेंगे। अलाव के पास बैठे कुन्नू ने बताया कि हमारी सारी जमीन, घर बाढ़ में समा गया है। अब जीवनयापन के लिए मजदूरी के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। काफी दिनों से मजदूरी भी नहीं मिल रही है।
इसलिए कपड़े से ज्यादा जरूरी है कि पहले हम खाने का इंतजाम करें। थोड़ा आगे बढ़ने पर अलाव के पास बैठे रतिभान का मन टटोला तो बोले भीषण बाढ़ के समय एसडीएम साहब आए थे। उन्होंने बेघर हो गए लोगों को प्राथमिकता के आधार पर प्रधानमंत्री आवास दिलाए जाने की बात कही थी। हम आज भी तिरपाल लगाकर रहने को विवश हैं। एक छोटी सी झोपड़ी के सामने जल रही आग के पास अकेली बैठी महिला रूपा अपनी दुश्वारियां बताते हुए फफक पड़ी।
दिलासा देने पर रुंधते हुई आवाज में बताया, भैया हमार घर और जमीन सब गंगा मैया लील लिहिन है। हमरे कोई कमाय वाला नहीं है। कुछ दिन से कोटेदार बताय रहे कि तुमार राशन कार्ड कटि गवा है गल्ला न मिलि पाई। अब बताव भैया हम कइसे जिंदा रही। इन समस्याओं से केवल रूपा या कुन्नू ही नहीं बल्कि शुकुलपुरवा, अंगरौरा, अखरी तथा परमगोंडा गांव के 200 से अधिक वह परिवार जूझ रहे हैं जिनका घर व खेत सबकुछ बाढ़ निगल चुकी है।
सिर्फ मजदूरी के सहारे जीवनयापन को विवश यह बाढ़ पीड़ित पिछले काफी समय से काम नहीं मिलने पर आर्थिक तंगी व भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। बाढ़ के समय तो लंच पैकेट और लइया चना बांटने वालों का तांता लगा रहा। प्रशासन ने भी बाढ़ राहत पैकेट बांटे। लेकिन इस कड़ाके की ठंड में बाढ़ पीड़ितों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। शासकीय योजनाओं का तक इन्हें नहीं मिल पा रहा है।
जंगली जानवरों का भी रहता खतरा
घने कोहरे के बीच झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले परिवारों को जंगली जानवरों का भय रहता है। इनका कहना है कि क्षेत्र में भेड़िया बहुत हैं। कोहरे के कारण छोटे-छोटे बच्चों को शिकार बना सकते है।
गांवों में चौपाल लगाकर ग्रामीणों की समस्याओं का त्वरित निदान करवाने का प्रयास किया जा रहा है। शीघ्र ही बाढ़ पीड़ित गांवों में अधिकारियों के साथ चौपाल लगाकर उनकी समस्याओं का निदान करवाने का प्रयास किया जाएगा। बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर दूर करवाई जाएंगी।
- ज्ञान तिवारी, सेवता विधायक