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सहकारिता चुनाव करीब आने से कड़ाके की ठंड में गर्माई सियासत

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सहकारिता चुनाव करीब आने से ठंड में गरमाई सियासत
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सीतापुर। सहकारिता चुनाव करीब आने से कड़ाके की ठंड में भी जिले का सियासी पारा गरमाने लगा है। प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। सियासी दलों की कोशिश साधन सहकारी समितियों के चेयरमैन से लेकर जिला सहकारी विकास संघ और जिला सहकारी बैंक की चेयरमैनी हथियाने को लेकर है। सत्तारूढ़ भाजपा अबकी सहकारिता में भी कब्जा जमाने को आतुर दिख रही है। लिहाजा, सहकारिता चुनाव में वर्चस्व की जंग के आसार नजर आ रहे हैं।
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आगामी 29 व 30 जनवरी को चुनाव प्रक्रिया प्रस्तावित है। राजनीति की पहली सीढ़ी माने जाने वाले सहकारिता के चुनाव का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दलों ने अधिसूचना जारी होने के बाद साधन सहकारी समितियों के डायरेक्टर से लेकर डीसीडीएफ और डीसीबी में विभिन्न पदों पर जीत हासिल करने के उद्देश्य से बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सहकारिता की राजनीति को हमेशा प्रदेश में सत्ता के अनुकूल माना जाता है। प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होती है इस चुनाव में उसी का ही वर्चस्व रहता है। पिछले सहकारिता चुनाव के दौरान सूबे में सपा की सरकार थी। लिहाजा, जनपद में जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन पद पर सपा से ताल्लुक रखने वाले नीरज वर्मा काबिज हो गए। बोर्ड में भी अधिकतर सदस्य सपा से ही जुड़े माने जाते हैं। साधन सहकारी समितियों में भी सपा का दबदबा रहा है। जिले में 183 साधन सहकारी समितियों पर चुनाव होना है। इसके अलावा 30 हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग, 13 खादी एवं ग्रामोद्योग व छह मत्स्य विभाग की समितियां हैं। इसमें बहुमत कायम करके ही डीसीडीएफ और डीसीबी में वर्चस्व कायम किया जा सकता है। यहीं से तय होता है कि राज्य और राष्ट्र स्तर की सहकारी संस्थाओं में कौन से प्रतिनिधि जाएंगे। अब प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा के लिए सहकारिता में सपा के वर्चस्व को तोड़ना बड़ी चुनौती मानी जा रही है। भाजपा ने सहकारिता चुनाव में फतह हासिल करने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
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