सीतापुर। अमर उजाला की ओर से कार्यालय में आयोजित महिला संवाद कार्यक्रम में रविवार को महिलाओं ने नारी सशक्तिकरण के मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखी। छात्राओं ने समाज में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि महिलाओं के अंदर हौसला तो है पर उनको सही प्लेटफॉर्म नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह से उनके सामने समस्याएं आ रही हैं।
अगर घर में महिला के साथ हिंसा होती है तो उनके अंदर गुस्सा तो बहुत आता है, पर वह अपनी आवाज बाहर तक पहुंचाने में सफल नहीं हो पाती हैं। जिस दिन महिलाएं घर के अंदर उठने वाले हाथ को पकड़ लेंगी। उसी दिन महिला उत्पीड़न की घटनाएं बंद हो जाएंगी। क्योंकि किसी अच्छे काम की शुरुआत घर से ही होती है।
समाजसेवियों ने कहा कि महिला उत्पीड़न पर कानून तो बहुत बने हैं, पर असल जानकारी महिलाओं को न होने से वह इनके लाभ से वंचित हो रही हैं। यह सब तभी संभव होगा, जब हर घर की महिला शिक्षित होगी। महिला शिक्षित तभी होगी, जब मां-बाप बेटा-बेटी में फर्क करना छोड़ देंगे। यह शुरुआत सबसे पहले हमें अपने घर से करनी होगी।
इस बार दीपावली इस संकल्प के साथ मनाएंगे कि बेटियों को शिक्षित जरूर करेंगे। उनकी शिक्षा में आने वाली हर बाधा को दूर करेंगे। शिक्षिकाओं ने कहा कि महिला सब कुछ जानते हुए भी अत्याचार सहती रहती है। क्योंकि उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी है। अगर आत्मविश्वास आ जाएगा तो वह पुरुषों की तरह आगे बढ़ सकेंगी।
कड़े हों कानून
लड़कों की तरह लड़कियों को भी आजादी मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जिंदगी व सही रास्ता खुद चुन सकें। इसके लिए उन्हें किसी के ऊपर निर्भर न होना पड़े। महिला उत्पीड़न पर और कड़े कानून की जरूरत है।
नीलम राठौर, समाजसेवी
दोनों समझें जिम्मेदारी
नारी व पुरुष दोनों एक ही सिक्के दो पहलू हैं। अगर पुरुष अत्याचार कर रहे हैं तो महिलाओं को भी समझना होगा। आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है। दोनों अपनी जिम्मेदारी समझें तो नहीं होगी कोई परेशानी।
प्रभा तिवारी, समाजसेवी
समझें एक-दूसरे का दर्द
अक्सर देखने में आता है कि गांव की गरीब महिलाएं अस्पताल में आकर लाइन में खड़ी रहती हैं। पढ़ी-लिखी अंदर चली जाती हैं। जब एक महिला दूसरे का दर्द समझेगी तो नारी सशिक्तकरण जरूर होगा। यह भावना अपने अंदर लानी होगी।
ममता डोडेजा, समाजसेवी
दोनों को पढ़ाएं
अगर मां-बाप अनपढ़ हैं तो वह अपने बच्चों को जरूर पढ़ाएं। यह ख्याल न रखें कि हम नहीं पढ़े तो क्या हुआ। बराबरी के साथ लड़का-लड़की के साथ व्यवहार करें। पढ़ाई जरूर कराएं।
रेनू राठौर, समाजसेवी
सामने वाले की देखें अच्छाई
हमें अपने गुस्से पर काबू पाना चाहिए। अगर सामने वाला गुस्से में है तो उसका बुराई नहीं, बल्कि अच्छाई देखें। जिस दिन बुराई व अच्छाई में फर्क समझ में आ जाएगा। उसी दिन से कुरीतियां समाप्त होने शुरू हो जाएंगी।
प्रीति अग्रवाल, समाजसेवी
आत्मनिर्भर बनें लड़कियां
लड़कियां आत्मनिर्भर जरूर बनें। लड़कियों को हर तरह की ट्रेनिंग दी जाए। जिससे उनको किसी बैसाखी का सहारा न लेना पड़े। जब हर फील्ड की जानकार होगी तो वह खुद ही अपना रास्ता तय कर लेगी।
शीतल अग्रवाल, समाजसेवी
महिला के समझें जज्बात
अगर महिला के साथ घटना होती है तो वह दो घरों की परेशानी का सबब बनती है। हम सबको इस परेशानी को समझना होगा। बेहतर होगा कि महिला के जज्बात समझें और परेशानी से मुक्ति पाएं।
सुषमा तिवारी, समाजसेवी
पुरुष व महिला को मिले बराबरी का हक
समाज में पुरुष व महिला को बराबरी का हक मिलना चाहिए। कहने को है, पर धरातल पर नहीं दिखाईं दे रहा है। इसके लिए महिलाओं को खुद आगे आकर लड़ाई लड़नी चाहिए।
प्रतिभा, शिक्षिका
बच्चों को दें अच्छे संस्कार
जीवन की सबसे बड़ी पहेली है संस्कार। अगर आप अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देंगे तो वह जरूर तरक्की करेंगे। यह संस्कार, नैतिक, शिक्षा व व्यवहार हैं। इनको अपनाकर एक अच्छा मुकाम कायम कर सकते हैं।
मुक्ति मिश्रा, शिक्षिका
शिक्षा की है कमी
आज की महिलाओं में शिक्षा की कमी है। यह रोजाना कार्यक्षेत्र में उभरकर बात सामने आ रही हैं। इसके प्रति महिलाएं जागरूक हों, तभी होगी समाज की तरक्की होगी।
जया सिंह, प्रोफेसर
बढ़ाएं आत्मविश्वास
आत्मविश्वास जिंदगी जीने का सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप के पास आत्मविश्वास है तो बड़ी से बड़ी परेशानी आसानी से निपट जाती है। यह विश्वास महिलाओं में बहुत कम है। इसको बढ़ाना होगा।
प्रियंका श्रीवास्तव, शिक्षिका
रोशनी का पर्व है दीपावली
दीपावली रोशनी का पर्व है। देश में रोशनी तभी आएगी, जब हर परिवार खुशहाल होगा। इसके लिए इस बार अपने देश में मिट्टी के दीप जलाएं। इस उजाले से समाज में फैले अधियारे को दूर करें।
सरोजनी, छात्रा
गांवों की ओर करेें रुख
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान तेजी से चल रहा है। इसके अच्छे परिणाम भी सामने आ रहे हैं। अधिकतर लोग अपनी बेटियों को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन उम्मीद के मुताबिक गांवों में इसकी कमी है। हम सब मिलकर गांव की बेटियों को उनके उत्थान के लिए सजग करना होगा।
संजना, छात्रा
बदली है प्रकृति
महिला अपराध पहले भी होते थे, आज भी हो रहे हैं। लेकिन अब इनकी प्रकृति बदल गई है। पहले की अपेक्षा जागरूकता आई है। अब महिलाएं थाना व कोर्ट कचहरी पहुंच रही हैं। क्योंकि उनके अंदर अधिकार जानने की इच्छा प्रबल हुई है। यह सिलसिला और भी आगे बढ़ाने की जरूरत है।
नीतू, छात्रा