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बुखार की चपेट में आकर तीन की मौत

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नटवलग्रंट में हुई 10वीं मौत, कुल 36 लोग मौत का हो चुके हैं शिकार
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औरंगाबाद/सीतापुर। गोंदलामऊ विकासखंड में बुखार की चपेट में आकर तीन लोगों की मौत हो गई। बुखार की वजह से मरने वाला का आंकड़ा 33 से बढ़कर 36 पहुंच गया है। इसमें अकेले नटवलग्रंट गांव में ही 10 लोगों की मौत हो चुकी है।

नटवलग्रंट निवासी छोटेलाल (55) कई दिनों से बुखार से पीड़ित थे। इनका इलाज जिला मुख्यालय के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। मंगलवार को इलाज के दौरान मौत हो गई। वहीं मुडियाकलां निवासी बदलू (60) चार दिन से बुखार के कारण दर्द से कराह रहे थे।
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कई चिकित्सकों को दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आखिर में इनकी भी मौत हो गई। सैदापुर निवासी रामहेत (18) बुखार से पीड़ित थे। पहले इन्होंने गांव आई टीम से दवा ली, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। इनकी भी मौत हो गई।

गोंदलामऊ विकासखंड में बुखार से मरने वाले की संख्या 33 से बढ़कर 36 पहुंच गई है। अकेले नटवलग्रंट में ही 10 की मौत हो चुकी है। गोंदलामऊ सीएचसी प्रभारी डॉ. धीरज मिश्रा का कहना है कि लिए गए नमूनों की जांच हुई थी। इसमें तीन लोगों को टायफाइड मिला था।

पानी की वजह से दिक्कत आ रही है। इसके लिए एसडीएम को पत्र लिखा जा चुका है। वहीं इतनी मौतों के बाद जिला प्रशासन की नींद खुली। सीडीओ संदीप कुमार ने गांव जाकर मरीजों का हालचाल लिया। सेक्रेटरी को गरीब लोगों को खाद्यान्न व साफ सफाई कराने के निर्देश दिए।

सीएम से करेंगे शिकायत
गांव जाकर मरीजों को देख चुका हूं। इस मामले में मुख्यमंत्री से मिलने गया था। लेकिन वह नहीं मिल पाए थे। अगर प्रशासन पानी के टैंकर नहीं दे पा रहा है तो इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से करूंगा।
-रामकृष्ण भार्गव, विधायक

कल देखेंगे
पानी के टैंकर के लिए जिलाधिकारी ने जल निगम को निर्देशित किया था। अगर टैंकर नहीं पहुंचे है तो कल दिखवाऊंगा।
-राजीव पांडेय, एसडीएम

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हर आंख में बस बुखार का ही खौफ
औरंगाबाद/सीतापुर। हर आंख बेचैन, हर तरफ बस बुखार का ही खौफ। बस एक दूसरे की ओर मदद की टकटकी लगाए निगाहें। कोई गांव के स्कूल में बने अस्पताल में दर्द से कराह रहा है तो कोई घर के अंदर रो रहा है। मां-बाप बस अपनी लाडले के आंखों में आंखें डालकर उसका दर्द बांटने की कोशिश कर रहे हैं।

सब यही कह रहे हैं, हाय भगवान क्या गलती हो गई जो इस तरह की मुसीबत हमारे गांव पर डाल दी। किसी ने बुखार में अपनी पत्नी को खो दिया तो किसी ने अपने बेटों को। फिर भी मौतों का सिलसिला नहीं थमा है। मदद के नाम पर केवल लाल-पीली गोली ही मिल रही है।

स्वास्थ्य विभाग लाचार दिख रहा है जब मौतों का नंबर नहीं थमा तो कुछ सक्रिय हुए। स्कूल के भवन में दवा पानी लेकर बैठ गए। जिस कमरे में इलाज कर रहे। उस कमरे में डॉक्टर साहब तो पंखे की हवा खा रहे हैं पर मरीज गर्मी में बेहाल थे। परिवारीजन किसी तरह राहत देने का प्रयास कर रहे हैं।

कुछ ऐसा ही नजारे गोंदलामऊ के नटवलग्रंट गांव में मंगलवार को सुबह 11 बजे दिखाई दिए। इस गांव में बुखार से अब तक नौ लोगों की मौत हो चुकी हैं। 50 से अधिक लोग तेज बुखार की चपेट में हैं। पूरा गांव प्रशासनिक लापरवाही से आक्रोशित है। नटवलग्रंट गांव की आबादी करीब पांच सौ है। इस गांव में करीब 80 घर बने हुए हैं।

हाल ये है गांव का ऐसा कोई घर नहीं बचा है जिसमे लोग बुखार से पीड़ित न हो। यह गांव बुखार से सबसे अधिक पीड़ित हैं। जिन नौ लोगों की मौत हो चुकी है। उनको पहले से कोई खास बीमारी भी नहीं थी। ऐसे में अचानक बुखार आने के बाद उनकी मौत हो गई।

स्वास्थ्य महकमा भले ही इससे इंकार कर रहा है पर उसकी यह थ्योरी किसी के गले नहीं उतर रही है। जब कोई गंभीर बीमारी नहीं है तो आखिर मौत-दर-मौत क्यों हो रही है। सब अफसर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर बचने का प्रयास कर रहे हैं। गांव में पिछले 15 दिन से प्रकोप फैला हुआ है।

जब खूब हो हल्ला मचा तो सोमवार को गांव टीम पहुुंची। एक स्कूल में कैम्प लगाकर गर्मी में इलाज शुरु करा दिया। प्राथमिक स्कूल के भवन में मरीजों के लेटने के लिए बिस्तर तक नहीं है। वह अपनी खाट पर ही लेटकर इलाज करा रहे है। जब घर में खाट नहीं मिली तो एक ही खाट पर दो-दो मरीजों को ग्लूकोज चढ़ाया जा रहा है।

गंदगी के आलम यह है स्कूल भवन के दूसरे कमरे में गंदगी फैली हुई है। वहीं पड़ोस में ही मरीज लेटकर इलाज करा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि केवल कागजों पर खानापूर्ति हो रही है। मरीजों का हाल लेना वाला कोई नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल इस विकासखंड के 12 से अधिक गांवों के बने हुए हैं।

डर की वजह से स्कूल नहीं आ रहे नौनिहाल
प्राथमिक विद्यालय नटवलग्रंट जमुनापुर में 93 नौनिहाल पंजीकृत है। मंगलवार को केवल तीन बच्चे ही स्कूल आए थे। स्कूल के शिक्षक भी वायरल की चपेट में है। प्रधानाध्यापक पुष्पेंद्र सिंह का कहना है कि जब से गांव में बुखार का प्रकोप फैला तभी से छात्र संख्या में गिरावट आ गई है। सभी बच्चे बुखार की चपेट में आ चुके हैं।

कक्षा एक की सुषमा की बुखार से मौत भी हो चुकी है। इनके अभिभावकों से संपर्क करके न आने का कारण जाना तो सभी बच्चों के घर में कोई न कोई पीड़ित है। वह बुखार के डर की वजह से स्कूल नहीं आ रहे हैं। यहां की शिक्षिका सुभी व द्रविंद्रर भी जुकाम बुखार से ग्रसित है। यह लोग भी डरे सहमे तरीके से स्कूल खोल रहे है। जबकि स्कूल में छात्र संख्या न के बराबर हो रही है।

हैंडपंप उगल रहे दूषित पानी, पर पीने को मजबूर
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि यह बीमारी सिर्फ दूषित पानी की वजह से हो रही है। गांव के हैंडपंप बंद किए जाए व टैंकर के जरिए पानी की सप्लाई की जाए। तभी रोकथाम लग सकती है। नटवलग्रंट गांव में 8 हैंडपंप लगे हुए है। इन हैंडपंपों के पानी की जांच कराई गई थी। जिसमें पांच का पानी खराब मिला था।

इस पर इनको बंद करा देना चाहिए था। लेकिन जिम्मेदारों ने केवल दो हैंडपंप ही रिबोर कराए। बाकी सभी हैंडपंप पहले की तरह चल रहे हैे। सुंदरलाल का कहना है कि हम तो पानी पीना बंद कर देंगे लेकिन उसकी वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए। लीलावती ने बताया अफसर आकर झूठ बोलकर चले जाते है।

अगर इस हैंडपंप का पानी न पिएं तो कहां से पानी लाए। इन लोगों के घर के सामने लगा हैंडपंप दूषित पानी उगल रहा है। यही हाल गांव के अन्य हैंडपंपों का है। ऐसे में मर्ज बताई जा रही है पर लापरवाह जिला प्रशासन इस मर्ज का इलाज नहीं कर पा रहा है। ग्रामीण दूषित पानी पीने को मजबूर हो रहे हैं।

दो घंटे में पीला हो जाता पानी
तुलाराम के घर के सामने हैंडपंप लगा हुआ है। इस हैंडपंप में दूषित पानी आ रहा है। तुलाराम की पत्नी की इस पानी को पीने से मौत हो चुकी है। पानी का नमूना लिया गया था लेकिन यह आज भी चल रहा है। गांव के प्रकाश का कहना है दो घंटे तक पानी रखने के बाद वह पीला पड़ जाता है। इसको पीने से मेरे चार बच्चे बीमार हो चुके हैं। अफसर भी जानते है पानी खराब है पर वह शुद्ध पानी उपलब्ध भी नहीं करा पा रहे हैं।

गांव के किनारे निकले नाले में जलभराव
नटवलग्रंट गांव के किनारे से एक नाला निकला हुआ है। इस नाले में पानी का ठहराव रुका हुआ है। इसकी वजह से काफी दिनों से भरा पानी होने के कारण यह बदबूदार हो गया है। इसमेें मच्छरों ने अपना ठिकाना बना लिया है। इस नाले के पड़ोस में रहने वाले लोग बुखार से पीड़ित है।

गांव में सफाई के नाम पर केवल स्कूल के आसपास ही झाडू लगवा दी गई। ग्रामीणों का कहना है कि अगर इस नाले के पानी को हटा दिया जाए तो मच्छरों के प्रकोप से राहत मिल जाएगी। वही स्वास्थ्य विभाग भी इस पानी को बीमारी की वजह बता रहा है।

बुखार के डर से कर रहे पलायन
जब गांव वालों को प्रशासनिक मदद नहीं मिली। बुखार के नाम पर गांव से लेकर सीएचसी तक केवल रिफर का ही सिलसिला चलता रहा। मौत दर मौत होती रही तो ग्रामीणों ने मजबूरी में पलायन शुरु कर दिया। रामबेटी बुखार से कराह रही है। गांव के सरकारी स्कूल में लेटकर इलाज करा रही है।

इनकी लड़की नीतू कुछ दिन पहले आई थी। जब बुखार नहीं थमा तो इन्होंने अपनी लड़की को जबरदस्ती ससुराल भेज दिया। दोनो बच्चों को ननिहाल टहलने की बात कहकर छोड़ आई। अब वह अकेले गांव में रहकर परेशान है। वहीं सुशील की बहन लज्जावती कुछ दिन पहले ही अपने भाई के पास आई थी।

जब बीमारी फैलने लगी तो सुशील डर गए। बहन को उसके घर भेज आए। सुशील का कहना है कि अगर गांव के हालात सही होते तो बहन अपने घर न गई होती। ऐसे गांव के करीब 20 परिवार है जिन्होंने अपने बच्चों को ननिहाल व दूसरी रिश्तेदारी में भेज दिया है। मिथलेश व अनिल कुमार भी अपने परिवार को दूसरी जगह पर शिफ्ट कर दिया है।

ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन
जब स्वास्थ्य विभाग से पूरी मदद नहीं मिली तो ग्रामीण भड़क गए। नंदकिशोर, राजिन्द्रर, रामखेलावन का कहना है कि हम लोगों के खून के नमूने लिए गए थे। 15 दिन बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट नहीं मिली है। डॉक्टर से पूछते हैं तो वह केवल सामान्य वायरल की ही बात कहते है। रिपोर्ट न मिलने से आहत होकर ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया। जिला प्रशासन पर पानी न उपलब्ध करा पाने का आरोप लगाया।

आखिर कहां गया पानी का टैंक
दो बार एसडीएम राजीव पांडेय गांव जा चुके हैं। इस पर उन्होंने पानी के टैंकर से सप्लाई करने के निर्देश दिए थे। यह निर्देश सिर्फ हवा हवाई साबित हुए है। वह भी जब मौतों का सिलसिला रहा। मंगलवार को भी पानी का टैंकर नहीं पहुंच सका। ग्रामीण मजबूरी में दूषित पानी पीते रहे।

सीडीओ के आने पर जागे अफसर
डीएम के न पहुंचने से गांव वालों में काफी नाराजगी व्याप्त है। इस पर सीडीओ संदीप कुमार मंगलवार को गांव पहुंचे। सीडीओ के आने की सूचना पर सफाई कर्मचारियों की फौज उतार दी गई। स्कूल परिसर से लेकर सड़क के आसपास तक की गंदगी साफ कर दी गई। ग्रामीणों का कहना था कि अगर यही जोश पहले से दिखाया होता तो आज यह गंदगी न होती।

मां बीमार, पापा साथ में, आखिर कौन बनाएं खाना
पूरे गांव में बुखार की दहशत फैली हुई है। इस दहशत में कई परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा है। जगदीश की पत्नी बुखार से परेशान होकर सीएचसी मिश्रिख में भर्ती है। जगदीश अस्पताल में पत्नी के साथ है। पांच बच्चे घर पर अकेले है। इनको देखने वाला भी कोई नहीं है। बच्चे इतने बड़े भी नहीं है कि वह सबकुछ समझ गए।
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घर में सबसे बड़ी बेटी पूनम अपने छोटे भाई बहन विवेक, पवन, पंकज व प्रीति का देखभाल कर रही है। घर पर खाना बनाने वाला कोई नहीं है। अगर पूनम खाना बनाने का प्रयास करती तो अन्य भाई बहने रोने लगते। पूनम से जब खाने की बात पूछी तो सिर्फ आंख से आंसू ही निकल आए।
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