महंगी फीस, महंगे ड्रेस और महंगी किताबों के बावजूद अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला निजी और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में कराने में तरजीह दे रहे हैं। हर साल इन स्कूलों और इनमें बच्चों के नामांकन में लगातार इजाफा हो रहा है।
उधर, सरकारी स्कूलों में सब कुछ निशुल्क होने और उच्च डिग्रीधारी अनुभवी व प्रशिक्षित शिक्षकों की तैनाती के बावजूद न बच्चे मिल रहे हैं और न ही अभिभावकों में कोई रुचि दिख रही है। अन्य अभिभावक तो दूर इन स्कूलों के शिक्षक, शिक्षामित्र और विभागीय अधिकारी ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने से कतराते हैं।
सरकारी स्कूलों की दुर्व्यवस्था पर प्रदेश के मुखिया के ताजा बयान के बाद सरकारी और निजी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था के इस फर्क को समझने की कोशिश की गई तो कई रोचक और चौंकाने वाली हकीकत सामने आई।
सबको साक्षर बनाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, मगर असल समस्या पर किसी का ध्यान ही नहीं है। थोड़ी सतर्कता और सजगता के साथ सिर्फ सरकारी स्कूलों के संसाधनों को सुदृढ़ कर दिया जाए तो यह स्कूल निजी स्कूलों से मुकाबले में कहीं पीछे नहीं रहेंगे।
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अजय प्रताप सिंह ने बताया कि परिषदीय स्कूलों की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास चल रहा है। वार्षिक परीक्षाएं, प्रवेशोत्सव जैसे कार्यक्रमों से परिषदीय स्कूलों की नई छवि बन रही है। जनप्रतिनिधियों का सहयोग लेकर स्कूलों में नामांकन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। अध्यापकों की जिम्मेदारी तय करते हुए लापरवाह शिक्षकों पर कार्रवाई भी हो रही है।