सिद्धार्थनगर। बीटेक और एमसीए की पढ़ाई करके बाद युवाओं ने मछली पालन में कदम रखा तो यहां भी इंजीनियरिंग नजर आने लगा। उन्होंने न केवल खुद की तरक्की की है बल्कि विकास का प्रतिमान बनाया है। खुद के साथ ही वे अन्य लोगों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए हैं। उनकी नई सोच के साथ मेहनत रंग लाई और वे नजीर बन गए हैं। मस्त्य पालन विभाग भी उनकी तकनीकी की रिपोर्ट मांगी है ताकि इसे प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जा सके।
छह साल पहले मछली पालन में नई तकनीक का प्रयोग बढ़ा तो उत्पादन और रकबा दोनों बढ़ने लगा। आधुनिक तकनीक से पानी में ऑक्सीजन बढ़ाया तो परंपरागत तरीके की अपेक्षा डेढ़ गुना फायदा हो गया। अब दूसरे जिलों के लोग भी यहां तकनीक सीखने आ रहे हैं। बढ़नी के अकरहरा के किसानों ने नए तरीके अपनाकर मछली पालन में क्रांति लाई है। पॉलीकल्चर टेक्निक के साथ कई मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है, जिसमें तालाब में मछलियों की संख्या अधिक हो जा रही है। यहीं कारण है कि कामर्शियल मछली पालन में सिद्धार्थनगर प्रदेश में सबसे आगे निकल गया है।
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पानी में ऑक्सीजन और तापमान
बीटे डिग्रीधारक शहबाज अनवर ने बताया कि उन्होंने 25 एकड़ क्षेत्र में मछली पालन किया और 18 लोगों को इससे प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिला है। परंपरागंत तरीके से मछली पालन में एक एकड़ क्षेत्र में 2.5 से 3 लाख रुपये खर्च आता था, जबकि इसमें ही कामर्शियल विधि से करने में 6 लाख रुपये खर्च आता है। कई प्रजातियों की मछली तैयार होती है और उत्पादन भी डेढ़ गुना हो रहा है। 2017 से जिले में पंगेसियस मछली पालन में बढ़ोत्तरी होने लगी। उसके पहले दो साल तक इसे परंपरागत तालाब में पालकर ट्रायल लिया गया। पंगेसियस प्रजाति के कारण जिले में मछली उत्पादन में वृद्धि हुई। दक्षिण भारत की प्रजाति की मछलियों को 24 डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिए, जबकि 18 डिग्री सेल्सियस से तापमान कम नहीं होना चाहिए। इन मछलियों को पालन के लिए पानी में मशीनों से ऑक्सीजन बढ़ाया जाता है, सर्दियों में पानी का तापमान को विशेष ध्यान रखा जाता है।
इस प्रकार बढ़ाते हैं तापमान
सर्दियों के पानी का तापमान कम होने पर पंगेसियस प्रजाति की मछलियों का विकास कम हो जाता है, जबकि इस दौरान उन्हें खुराक कम दिया जाए तो मर भी सकती हैं। पहले यहां इस प्रजाति की मछलियां नहीं पाली जाती थी।
सर्दियों में पानी का तापमान 2 से 5 डिग्री तक हो जाता है, जबकि दो फीट नीचे के पानी का तापमान कम रहता है और मछलिया नीचे की ओर रहती है। इसमें लगातार पानी चलाते हैं और ऊपर से पानी निकलता रहता है, जिससे फसलों की सिंचाई होती तो उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। पाइप के माध्यम से सतह में ट्यूबवेल का 28 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला पानी जाता है तो तालाब का तापमान 20 से 22 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। करीब दो ग्राम की मछलियों को नर्सरी तालाब में रखते हैं, जब वह 50 ग्राम की हो जाती है तो बड़े तालाब में डाल देते हैं।
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ऐसे बढ़ाते हैं पानी में ऑक्सीजन
एयर ब्लोवर- इससे पानी में पाइप डाल दिया जाता है, जो हवा फेंकता रहता है। इससे पानी में घुलनशील ऑक्सीजन बढ़ जाता है।
पैडल एरेटर- यह चरखानुमा होता है। पानी के ऊपरी सतह पर लगा देने से पानी उठाकर ऊपर फेंकता रहता है तो ऑक्सीजन बढ़ जाती है।
एयर ब्लोइंग मशीन- यह पंप पानी में तैरता रहता है और नोजल के माध्यम से हवा फेंकता रहता है। पानी में ऑक्सीजन बढ़ता है तो हानिकारक गैस बाहर चली जाती है।
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पॉली कल्चर विधि से हुई तरक्की
एमसीए डिग्री धारक वकार अनवर फैज ने 35 एकड़ खेत को तालाब बना दिया है और इससे 25 लाेगों को रोजगार मिला भी मिला है। वे बताते हैं कि
पॉलीकल्चर तकनीक से मछली पालन में फायदा बढ़ा। परंपरागत तरीके की अपेक्षा अब डेढ़ गुना फायदा हो रहा है। अलग अलग प्रजाति की मछलियां पानी के तीन स्तर पर रहती हैं। पंगेसियस और रुपचंदा ऊपरी सतह पर रहती हैं, जबकि रोहू कतला मध्यम में रहती हैं। सबसे नीचे नैनी रहती हैं। पंगेसियस को दाना डाला जाता है, जबकि नीचे रहने वाली मछलियां बचे हुए दाने व कचड़े खाकर रहती हैं। एक एकड़ तालाब में 750 से 1000 रोहू, 1000 सिल्वर कार्प एवं 1000-1500 नैनी, अमूर कार्प 1000-1500 के बच्चे ही डाले जाता था, जबकि इसमें अब 12000 पंगेसियस के बच्चे अतिरिक्त डाले जा रहे हैं। एक सीजन में एक 110-125 क्विंटल पंगेसियस,, 10-11 क्विंटल रूपचन्दा, 20 से 35 क्विंटल इंडियन मेजर कार्प का उत्पादन हो रहा है।
पाली कल्चर तकनीक में दाने का खर्च 25% तक कम हो जाता है, चूंकि सिर्फ पंगेसियस को फीड दिया जाता है और इंडियन मेजर कार्प को रीसाइक्लिंग फीड के रूप में दिया जाता है, जिससे इंडियन मेजर कार्प को अलग से दाना नहीं दिया जाता है।
पाली कल्चर टेक्नीक मे तालाब में प्रबंधन बहुत अच्छे से किया जाता है, जिससे रोग, दवा आदि का खर्च बहुत कम आता है। ऑक्सीजन की उपलब्धता के कारण मछली की मृत्यु दर बहुत कम हो जाती है। इससे किसान करीब डेढ़ गुना लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
वर्जन
जिले में मछली पालन के क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है। सरकारी स्तर पर योजनाओं के माध्यम से मछली पालकों की मदद की जा रही है। अकरहरा के युवा मछली पालन के क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे हैं, वहां तकनीक का भी बेहतर प्रयोग हुआ है।
कुलदीप सक्सेना, इंस्पेक्टर, मत्स्य पालन विभाग