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Siddharthnagar News: स्पोर्ट्स स्टेडियम में अर्जुन तो बहुत हैं, बस द्रोणाचार्य की जरूरत

Mon, 12 Jan 2026 10:55 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में ​स्थित  तरणताल। संवाद
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- स्पोर्ट्स स्टेडियम बनाने में करोड़ों हुए खर्च, लेकिन कोच के न होने से खिलाडि़यों की प्रैक्टिस रह जा रही अधूरी
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- खेलो इंडिया में पदक जीतने का सपना भी धीरे-धीरे टूट रहा
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। देश जहां खेलो इंडिया के मंच से भविष्य के चैंपियन तलाश रहा है, वहीं सिद्धार्थनगर के होनहार खिलाड़ी अपने ही जिले में मौके के इंतजार में टूटते जा रहे हैं। नौ एकड़ में फैला जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम आज भी शोपीस बनकर खड़ा है। यहां मैदान हैं, भवन हैं, तरणताल भी हैं, लेकिन खिलाड़ियों को तराशने वाला कोई नहीं।
ग्राउंड पर खिलाड़ी अभ्यास जरूर कर रहे हैं, लेकिन उन्हें निखारने वाला कोई नहीं है। इसका दर्द खिलाड़ियों पर साफ झलक रहा था। एथलेटिक्स खिलाड़ी रोहित ने बताया कि हमें खेलो इंडिया के लिए तैयारी करने के लिए कहा गया है, लेकिन कोच नहीं होने से हमारी तैयारी सही से नहीं हो पा रही है। फुटबॉल खिलाड़ी सुमित ने बताया कि पैरेंट्स कहते हैं कि खेल छोड़ दो, क्योंकि यहां न ट्रेनिंग है न भविष्य। जिले में ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अगर सही कोचिंग मिले तो वह देश और प्रदेश का नाम रोशन कर सकते हैं, लेकिन सालों से चली आ रही अनदेखी ने खेल को नहीं, बल्कि खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को चोट पहुंचाई है।
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स्टेडियम की दीवारों पर टंगे बोर्ड करोड़ों की योजनाओं की गवाही देते हैं, लेकिन मैदान में खिलाडि़यों का बहता पसीना बेकार चला जा रहा है। खेलो इंडिया जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम जिन प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए हैं, वे यहां शुरुआत में ही दम तोड़ देती हैं। तीन दशक बाद भी यह स्टेडियम नीति, नियोजन और निगरानी के अभाव में फंसा हुआ है। सवाल सिर्फ सुविधाओं का नहीं, बल्कि उन सपनों का है, जो हर रोज इस मैदान टूट रहा है।
सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी रघुनाथ बताते हैं कि तीन दशक पहले जब यह स्टेडियम बना था तो पदक जीतने के सपने देख गए थे, आज वहां खामोशी छाई हुई है। खेलो इंडिया जैसे मंच तक पहुंचने का सपना देखने वाले जिले के युवा प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के अभाव में या तो बड़े शहरों का रुख कर लेते हैं या फिर मजबूरी में अपने हुनर को ही दफना देते हैं। जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में अभिलेखोें का कामकाज संभाल रहे कमलेंद्र प्रताप चौधरी बताते हैं कि क्रीड़ा अधिकारी के रिटायर होने के बाद स्टेडियम के कागजात और अन्य गतिविधियों पर ध्यान दिया जा रहा है। फिलहाल किसी को स्थायी जिम्मेदारी नहीं दी गई है। मौजूद कोच के सहयोग से खेल प्रतियोगिताएं कराई जा रही हैं।
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तरणताल पर आठ करोड़, हॉकी पर शून्य
साल 2017 में बने तरणताल (स्विमिंग पूल) पर करीब आठ करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन यह बस शोपीस बनकर रह गया है। इसके अलावा हॉकी जैसे राष्ट्रीय खेल के लिए स्टेडियम में एक भी साजो-सामान उपलब्ध नहीं है। एथलेटिक्स, ताइक्वांडो और कुश्ती जैसे खेल केवल कागजों और नाम भर के लिए ही संचालित हो रहे हैं। कुश्ती के लिए मैट जरूर है, लेकिन कोच न होने की वजह से खिलाड़ी सही से प्रैक्टिस नहीं कर पाते हैं।

अधूरी सुविधाएं, बिखरा खेल ढांचा
- स्टेडियम में साल 2005 में बैडमिंटन हॉल बना, बास्केटबॉल कोर्ट और फुटबॉल पोल लगाए गए। इसके अलावा जूडो की भी व्यवस्था की गई, लेकिन नियमित कोच और आधुनिक संसाधनों के अभाव में ये सभी सुविधाएं सिर्फ ढांचा बनकर रह गई हैं। अंशकालीन कोचों का रिन्यूअल न होने की आशंका से कई खिलाडि़यों ने स्टेडियम आना ही छोड़ दिया है। हालांकि फुटबॉल कोच का रिन्यूअल लगातार दूसरी बार किया गया है।
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कोच आते रहे, खेल पिछड़ते रहे
स्टेडियम में कोचों और क्रीड़ा अधिकारियों का इतिहास भी अस्थिर रहा है। 1995 में कुश्ती कोच एसडीएस यादव आए, लेकिन कुछ ही दिन टिक सके। 1996 में हॉकी कोच रहीस अख्तर केवल एक ही साल तक यहां रहे। इसी दौरान एसएन यादव फुटबॉल कोच और उपक्रीड़ा अधिकारी बने, जो साल 2000 तक रहे। आरपी सिंह हैंडबॉल कोच रहे। 2003 में चंदन आए, जो चार साल बाद चले गए। 2015 में ताइक्वांडो कोच राजकुमार, 2017 में हैंडबॉल की फरीदा खान और कुश्ती के एसडीएस यादव भी यहां स्थायी रूप से नहीं रह सके। वर्ष 2022 से 2025 तक तैराकी कोच आशुतोष अग्निहोत्री लगातार सेवाएं देते रहे, लेकिन 31 दिसंबर को वह रिटायर हो गए।
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तीन दशक बाद भी अधूरा सपना
करीब 32 वर्ष बीत जाने के बाद भी जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम स्पष्ट खेल नीति, पर्याप्त बजट और सख्त निगरानी के अभाव से जूझ रहा है। करोड़ों के निर्माण कार्य सवालों के घेरे में हैं, जबकि खिलाड़ियों का भविष्य आज भी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।
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पहलवानों को सिखाने वाला कोई नहीं
स्टेडियम में कुश्ती के मैट मौजूद हैं, लेकिन इसका लाभ खिलाड़ियों को नहीं मिल पा रहा। सही तरह से कोचिंग न मिलने की वजह से जिले के पहलवान कभी भी आगे नहीं बढ़ सके। बताया जाता है कि कुश्ती कोच एसडीएस यादव दोनों कार्यकाल मिलाकर भी दो वर्ष पूरे नहीं कर पाए।
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