सिद्धार्थनगर। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ इस बार हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 की शुरुआत होगी। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष का नाम रौद्र संवत्सर है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना आरंभ हुई थी। इस बार का नव संवत्सर कई मायनों में खास माना जा रहा है, क्योंकि अधिक मास पड़ने के कारण पूरे वर्ष में 12 की जगह 13 महीने होंगे। ज्येष्ठ माह इस बार दो माह का होगा।
वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन तक रहेगी। वहीं ग्रहों की स्थिति के अनुसार, बृहस्पति को वर्ष का राजा और मंगल को मंत्री माना गया है। जिले के कई मंदिरों और धार्मिक संगठनों की ओर से भी नव संवत्सर के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई है। श्रद्धालु इस दिन पूजा-पाठ, पंचांग पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ नए वर्ष का स्वागत करेंगे।
ज्योतिषाचार्य सतीश मणि त्रिपाठी के अनुसार, हिंदू पंचांग में 60 संवत्सरों का चक्र चलता है और हर वर्ष का अलग नाम और प्रभाव बताया जाता है। इस बार शुरू होने वाला वर्ष रौद्र संवत्सर कहलाएगा। परंपरागत मान्यता के अनुसार यह संवत्सर ऊर्जा, सक्रियता और परिवर्तन का संकेत देने वाला माना जाता है।
पारंपरिक मान्यता है कि जब बृहस्पति वर्ष के राजा होते हैं तो धर्म, ज्ञान और सामाजिक संतुलन को बढ़ावा मिलता है। वहीं मंगल के मंत्री होने से ऊर्जा, साहस और सक्रियता का प्रभाव देखा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित पवन त्रिपाठी बताते हैं कि नव संवत्सर भारतीय संस्कृति में केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन से पूरे वर्ष के पर्व-त्योहारों का क्रम तय होता है और कई लोग नए कार्यों की शुरुआत भी इसी दिन से करते हैं।
नव संवत्सर 2083 एक नजर में
- शुरुआत : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च)
- संवत्सर का नाम : रौद्र संवत्सर
- वर्ष का राजा : बृहस्पति
- मंत्री : मंगल
- विशेषता : अधिक मास के कारण 13 महीने
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क्यों खास है यह दिन
- इसी दिन से हिंदू नववर्ष की शुरुआत
- मान्यता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की
- नवरात्र भी इसी दिन से शुरू
- पूरे वर्ष के पर्वों का क्रम इसी दिन तय होता है
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वैज्ञानिक माना जाता है हिंदू पंचांग
- सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति पर आधारित गणना
- हर तीन वर्ष में अधिक मास से समय का संतुलन
- ऋतु और पर्वों का क्रम लगभग स्थिर रहता है
- हजारों वर्षों से प्रयोग में आ रहा कैलेंडर