सिद्धार्थनगर के मिश्रौलिया क्षेत्र में बन रही कच्ची शराब।
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सिद्धार्थनगर। कच्ची शराब का धंधा जिले के लिए नासूर बन गया है। कई जिंदगियां खत्म हो गई, सैकड़ों परिवार बर्बाद हो गए। मासूमों का बचपन छिन रहा है और भविष्य अंधेरे में है। बावजूद इस गोरखधंधे पर अंकुश नहीं लग पा रहा। पुलिस-प्रशासन ने कई बार पहल की, मगर मजबूत संरक्षण के चलते नतीजा सिफर रहा। हर वर्ग आए दिन इसके विरोध में आवाज उठाता रहा है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व की उपेक्षा से कोई असर नहीं हो रहा। बुद्धभूमि की साख पर बट्टा लगाते इस धंधे से आहत लोग इसे नष्ट करने को लेकर मुखर हो रहे हैं। उनके लिए चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा रहेगा।
आंकड़ों पर गौर करें तो 12 थाना क्षेत्रों के 59 गांव ऐसे हैं, जहां कच्ची शराब का धंधा फल-फूल रहा है। महिला-पुरुष के अलावा इन गांवों के तमाम बच्चों को भी इसी में लगा दिया गया है। संज्ञान में होने के बावजूद जिम्मेदार कभी भौगोलिक परिस्थिति का हवाला देकर हाथ खड़े कर देते हैं तो कभी नियम-कानून और सूचना तंत्र की खामियों से बंध जाते हैं। धंधेबाज इसका खूब लाभ उठा रहे हैं। करीब एक वर्ष पहले तत्कालीन एसपी अजय कुमार साहनी ने कच्ची के जड़ पर प्रहार करने के मकसद से ऑपरेशन मुक्तांगन शुरू किया था। जितने शोर-गुल के साथ इस अभियान की शुरुआत हुई, उतने ही तेजी से इसकी हवा भी निकल गई।
अभियान के तहत चिह्नित गांवों की महिलाओं को साथ लेकर जागरूकता अभियान छेड़ा गया था। इसके तहत उन्हें पुलिस विभाग ने कार्ड भी जारी किया। महिलाओं का दायित्व था कि गांव में शराब बनाने और पीने वालों का विरोध करें। इससे बात न बनें तो पुलिस को अवगत कराएं। बच्चों के भविष्य का हवाला देकर पुलिस ने उन्हें मोटीवेट किया था। शुरू के कुछ दिनों में तो यह अभियान सार्थक दिशा में बढ़ा भी, लेकिन बाद में वहीं ठप हो गया।