सिद्धार्थनगर। पिपरहवा में खुदाई में निकले रत्नों की देश वापसी के बाद जिले के बौद्ध स्थली कपिलवस्तु में विकास की उम्मीद जगी है। स्थानीय लोगों के अनुसार अगर यह रत्न जिले में आते हैं तो यहां दर्शन करने वाले विदेशी पर्यटकों की तादाद बढ़नी तय है।
इससे कपिलवस्तु समेत पूरे जिले में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। विदेश चले गए पिपरहवा में खुदाई में निकले रत्नों की प्रधानमंत्री के प्रयास से हुई वापसी के बाद जिले के लोगों में उत्साह दिख रहा है। साथ ही इन रत्नों के जिले में लाने की मांग भी तेज हो गई है।
अन्य बौद्ध स्थलों के सापेक्ष कपिलवस्तु के पिपरहवा में समग्र विकास नहीं होने से सुविधाओं का अभाव है। इससे यहां पर्यटकों का आवागमन भी अन्य जगहों की तुलना में कम होता है। अब 127 वर्ष पहले पिपरहवा में खुदाई से निकले रत्नों की विदेश से वापसी के बाद यहां पर्यटकीय सुविधाओं के विकास की उम्मीद जगी है।
इस कारण इन महत्वपूर्ण रत्नों को जिले में लाने की मांग तेज होने लगी है। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी ने बताया कि भारत में रत्न आने से देश ही नहीं विश्व के सभी बौद्ध अनुयायी देश के लोगों ने इसकी सराहना की है। उन्होंने कहां कि यह एक गौरवपूर्ण क्षण था। लेकिन अब यह रत्न सिद्धार्थनगर के पिपरहवा में पुन: वापस आना चाहिए। इससे गौतम बुद्ध के क्रीड़ा आंगन में भी पर्यटन का नया फूल खिलेगा। इससे इस जिले का लुंबिनी की तर्ज पर विकास होगा।
खनन में मिले रत्नों का हुआ था बंटवारा खनन के दौरान मिले बौद्ध कालीन पुरावशेष के पांच भागों को कलकत्ता में संरक्षित किया गया, लेकिन एक हिस्सा पेप्पे अपने साथ लंदन ले गया।
इतिहासकारों ने बताया कि उस समय जो भी पुरावशेष मिले उनके कई भाग हुए तत्कालीन थाईलैंड के राजा श्यामी रामसे ने एक भाग प्राप्त किया और उसका कुछ हिस्सा श्रीलंका को भी दिया। उन अवशेषों पर थाईलैंड और श्रीलंका दोनों स्थानों पर बौद्ध मंदिर बनवाए गए है। मूल स्तूप से प्राप्त पिपरहवा रत्नों की कुल संख्या लगभग 1800 बताई जाती है। संवाद