सिद्धार्थनगर। बाजार में बिक रहे चटपटे स्वाद वाले व्यंजनों पर मत जाइए। इन चटपटे खानों का जायका कुछ देर के लिए जबान को लज्जत दे सकते हैं, लेकिन यह सेहत के लिए यह फायदेमंद नहीं हैं। गर्म समोसे, चाट-पकौड़े यह सब आपको बीमार बना सकते हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि होटल, रेस्टोरेंट, फास्टफूड वैन और ठेलों पर झटपट में तैयार होने वाला यह व्यंजन सेहत के लिए नुकसानदेह हैं। खराब किस्म के तेल में रंगों से युक्त मसाला डालकर इन्हें खाने में खस्ता और दिखने में आकर्षक बनाया जा रहा है। स्वाद भी चटपटा है, जिसके लोग इनके दीवाने हुए जा रहे हैं। देखने में आकर्षक लगने वाली बिरयानी और अन्य खाद्य पदार्थ वास्तव में सेहत के लिए धीमा जहर है।
चाइनीज व्यंजनों से भी बाजार पटा हुआ है। शहर के मुख्य चौक-चौराहों और सड़क के किनारे जालीदार खोखा में एग रोल, वेज बिरयानी, मोमोज, चिप्स, फिंगर चिप्स, चाऊमीन, पनीर चिल्ली जैसे चटपटे स्वाद वाली खाद्य सामग्री तैयार की जा रही है। फास्टफूड तैयार करने के इनके नुस्खे अलग हैं।
जानकार बताते हैं कि रिफाइंड तेल और वनस्पति घी के मिश्रण में यह कारोबारी फास्टफूड तैयार कर रहे हैं। इनकी वेरायटी रंगीन और दिखने में आकर्षक लग रही है। महिलाओं, बच्चों को यह खूब पसंद आ रहा है।
विशेष किस्म के रंग मिलाए जाने से एवं कई बार फ्राई करने से चाइनीज मोमो, फिंगर चिप्स, एगरोल स्वादिष्ट बन जाता है, लेकिन यह सेहत के लिए नुकसानदेह है। क्योंकि इनकी कड़ाही में एक ही बार तेल पड़ता है और उसी को बार- बार गर्म करके फास्टफूड तैयार किया जाता है, जिसका सीधा असर सेहत पर पड़ता है।
डॉक्टर बताते हैं कि इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, हर तीसरा बच्चा फास्टफूड के कारण पेट की बीमारी से ग्रसित मिल रहा है। कई मामलों में आंतों में संक्रमण तक देखा जा रहा है।
नॉन-वेज आइटम की मांग अधिक : शहर में डिलीवरी करने वाले सुजीत कुमार ने बताया कि करीब दो साल से यह कार्य कर रहे हैं। लोग ऑनलाइन प्लेटफाॅर्म से नॉन-वेज आइटम अधिक मंगाते हैं। इसके अलावा पिज्जा, बर्गर और बिरयानी की मांग अधिक है। पटरियों पर दुकान सजने वाली दुकानें भी ऑनलाइन डिलीवरी कर रही हैं।
रोग-प्रतिरोधक क्षमता हो रही कमजोर: फिजिशियन डॉ. रामजी सोनी के अनुसार, फास्टफूड में स्वाद बढ़ाने के लिए केमिकल और रंगों का उपयोग किया जाता है जबकि फाइबर युक्त भोजन की कमी हो रही है।
इससे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट रही है और वे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। सफाई की कमी के कारण डायरिया जैसी बीमारियां भी बढ़ रही हैं।
सिंथेटिक रंग से सेहत को खतरा: वरिष्ठ सर्जन डॉ. जीएम शुक्ल ने बताया कि चटनी और सॉस में सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है। लंबे समय तक इनके सेवन से आंतों में संक्रमण, पीलिया, पेट में अल्सर, नसों में खिंचाव और भूख कम लगने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
लीवर और किडनी को पहुंच रहा नुकसान: एमडी फिजीशियन डॉ. पीएल गुप्ता ने बताया कि गहरे पीले रंग की मिठाइयों में औरामिन जबकि लाल व हरे रंग के फास्टफूड में मेटानिल येलो और रोडामाइन जैसे केमिकल रंग मिलाए जाते हैं।
ये रंग बच्चों की शारीरिक वृद्धि रोकने के साथ लीवर और किडनी को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे पेट संक्रमण, एलर्जी, यूरिन इंफेक्शन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट आती है।