सिद्धार्थनगर। फाइनेंस कंपनियों के कर्ज के जाल में फंसे लोगों की जान देने की खबरें इस समय आम हो गई है। कंपनियों के एजेंट कर्ज न चुका पाने वाले लोगों पर खूब दबाव बनाते हैं, जिससे आहत होकर ये लोग इस तरह के आत्मघाती कदम उठाते हैं।
इसके बावजूद इन कंपनियों के एजेंटों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है, क्योंकि जब कार्रवाई के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की बात आती है तो पीडि़त परिवार पीछे हट जाते हैं। मजबूरी, सामाजिक दबाव, कानूनी जानकारी की कमी और फाइनेंस कंपनियों के मजबूत गठजोड़ के चलते एजेंटों पर शिकंजा कसना मुश्किल हो जाता है।
कुछ दिन पहले फाइनेंस कंपनियों के कर्ज के जाल में फंसी हरिगांव की रहने वाली ने माया ने एजेंटों के बढ़ते दबाव और उत्पीड़न की वजह से खुदकुशी कर ली थी, लेकिन परिजनों ने अभी तक पुलिस को कोई तहरीर नहीं दी है। इसलिए ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
जिले में अब तक चार ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें आत्महत्या की कोशिश या आत्महत्या का कारण वसूली का दबाव बताया गया, लेकिन किसी भी मामले में कार्रवाई नहीं हुई।
लोटन कोतवाली क्षेत्र के हरिगांव में फाइनेंस कंपनियों के एजेंटों द्वारा लगातार परेशान किए जाने से माया ने जहर खाकर जान दे दी थी। इससे पहले भी वह मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर घर छोड़कर पति के पास चली गई थी, लेकिन जब लौटकर आई तो फिर उत्पीड़न शुरू हो गया। अंत में कर्ज और उत्पीड़न से पीछा छुड़ाने के लिए माया ने जान दे दी।
परिवार ने पहले एजेंटों पर प्राथमिकी दर्ज कराने की बात कही, लेकिन तहरीर देने की बारी आई तो पूरे परिवार ने चुप्पी साध ली। इसी तरह पिछले दो वर्षों में तीन अन्य मामलों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।
एजेंटों की दबंगई, वसूली का दबाव, घर पर आकर गाली-गलौज और बेइज्जती, लेकिन शिकायत दर्ज कराने के बाद परिवार अदालत और थाने के चक्कर झेलने में सक्षम नहीं रह पाया।
गरीब परिवार उत्पीड़न झेलते हैं, लेकिन कानूनी लड़ाई लड़ने की ताकत नहीं जुटा पाते। फाइनेंस कंपनियों का नेटवर्क इतना मजबूत होता है कि गांव के स्तर पर इनके एजेंट, सुपरवाइजर, कंपनी के प्रभारी और स्थानीय प्रभावशाली लोगों का गठजोड़ बन जाता है। यही वजह है कि पीड़ित परिवार कार्रवाई से डर जाता है।
प्रशासन भी तब तक कठोर कदम नहीं उठाता जब तक पीड़ित परिवार आगे न आए।
विधि विशेषज्ञ का कहना है कि ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन को खुद आगे आकर स्वयं वादी बनकर कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही कंपनी पर संगठित अपराध में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए।
इस संबंध में थानाध्यक्ष डी के सरोज का कहना है कि माया की खुदकुशी के मामले में बिसरा रिपोर्ट व तहरीर मिलने के बाद विधिक कार्रवाई की जाएगी। पीड़ित से तहरीर देने के लिए कहा गया है, लेकिन अभी तक तहरीर मिली