सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में भले ही मरीज माफियाओं पर शिकंजा कसने के इंतजाम हुए हैं, लेकिन इनका नेटवर्क नहीं ध्वस्त हो पाया है। कॉलेज परिसर से लेकर गेट के बाहर तक फैले इनके नेटवर्क का नतीजा है कि बेहतर इलाज के नाम पर मरीज अब भी लूट का शिकार बन रहे हैं।
एजेंट मरीजों को अस्पताल के इर्द-गिर्द घूमकर फंसा रहे हैं और सड़क पर खड़ी टैक्सी या एंबुलेंस से मरीजों को निजी अस्पताल पहुंचा दिया जा रहा है। हालांकि परिसर के अंदर इनके खड़े होने पर सख्ती बरती जा रही है, फिर भी मरीज माफियाओं की सक्रियता से यह अपना काम अंजाम देने में लगे हुए हैं।
मेडिकल कॉलेज परिसर का दायरा बढ़ा है। इसके साथ ही निगरानी भी बढ़ी है, लेकिन मरीज माफियाओं पर शिकंजा कसना मुश्किल हो रहा है। मेडिकल कॉलेज आने वाले मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर परिसर के गेट के बाहर खड़े टैक्सियों अथवा गंभीर मरीजों को एंबुलेंस के माध्यम से निजी अस्पतालों तक पहुंचा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही नजारा शुक्रवार को इमरजेंसी में आए एक चोटिल मरीज के साथ देखने को मिला। उसे हड्डी में फ्रेक्चर के चलते एक निजी अस्पताल तक पहुंचा दिया गया। मरीज को बेहतर इलाज का भरोसा देते हुए मरीज माफिया तीमारदारों को बाहर खड़ी टैक्सी से निजी अस्पताल लेकर चले गए।
मरीज माफिया और टैक्सी और एंबुलेंस चालकों की आपसी सेटिंग भी तगड़ी है। इशारा मिलते ही निजी अस्पताल पहुंचाकर अपना और मरीज माफिया का तय हिस्सा वसूल लेते हैं। इसलिए कभी-कभी मरीज माफिया स्वयं न जाकर सिर्फ टैक्सी या एंबुलेंस चालक के माध्यम से ही मरीज को निजी अस्पताल पहुंचाकर अपने हिस्से की वसूली कर लेते हैं।
परिसर और गेट के बाहर होता बरगलाने का खेल : मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन 1500 से 2000 से अधिक ओपीडी होती है। इसके बाद इमेरजेंसी में सौ से अधिक गंभीर मरीज इलाज के लिए आते है। इनमें ओपीडी में आने वाले मरीजों में भी कई गंभीर मरीज होते है, जिन्हें तत्काल इलाज की जरूरत होती है।
इनमें हड्डी फ्रैक्चर आदि गंभीर रूप से घायल, सांस आदि के मरीज शामिल होते हैं। मरीज माफिया इनको जल्द ठीक होने के लिए बेहतर और सस्ता इलाज का झांसा देते हुए वरगलाते है। परिसर में नए-नए चेहरे भटकते हैं जो मरीजों को फंसाने का काम करते हैं।
नए भवन में गार्ड और कैमरा एक्टिव है, यहां काफी देर तक खड़े होने पर कई बार गार्ड कारण पूछ लेते हैं। इसलिए संदिग्ध अंदर डॉक्टरों के पास नहीं जाते हैं। हर दिन बड़ी संख्या में मरीज इनके शिकार हो रहे हैं। कुछ गेट के बाहर तो कुछ परिसर से मरीजों को फंसाने का काम करते हैं।