भनवापुर। डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कटरिया बाबू ग्राम पंचायत में स्थित लेंवड़ ताल की गोदी में विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक खजाने छिपे हैं। करीब 325 हेक्टेयर में फैले इस ताल में ठंड के मौसम में प्रवासी पक्षियों के सैरगाह लोगों का मनोरंजन के लिए काफी है। संरक्षण के अभाव में लेंवड़ ताल पर अतिक्रमण कर लोग निजी कामों में उपयोग कर रहे हैं। अगर जरा सा ध्यान दे दिया जाए तो इसे भी गोरखपुर के रामगढ़ताल की तरह विकसित किया जा सकता है, जिसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटक भी इस ओर आकर्षित होंगे। वहीं, इस ताल में भंडारित जल करीब आधा दर्जन से अधिक गांवों के किसानों की फसलों की सिंचाई के लिए यह वरदान साबित हो रहा है।
डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कटरिया बाबू ग्राम पंचायत में करीब 325 हेक्टेयर में स्थित लेवंड़ ताल की सीमा क्षेत्र के लेंवड़ी, सोहना, बुढ़ऊं, महुआ बुजुर्ग, दुफेड़िया आदि गांवों से लगती हैं। लेंवड़ ताल की मिट्टी का इस्तेमाल लोग घरों की सफेदी के लिए उपयोग करते हैं। वहीं, इसमें भंडारित जल किसानों को अपने फसलों की सिंचाई में काफी मददगार साबित हो रहा है। इस ताल में उगा कमल जहां पड़ोसी जिले बलरामपुर के तुलसीपुर देवीपाटन में मां दुर्गा को अर्पित करने के लिए जाता है। वहीं, आयरन से भरपूर तिन्नी का चावल स्थानीय लोगों के लिए किसी प्राकृतिक सौगात से कम नहीं है, जो परंपराओं के अनुसार सनातन संस्कृति के कुछ व्रत और त्योहार इस चावल के बगैर पूरे नहीं होते हैं।
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साइबेरियन पक्षियों की है सैरगाह
डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कटरिया बाबू ग्राम पंचायत में स्थित लेवंड़ ताल क्षेत्रीय लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। लेंवड़ ताल ही परासी नदी का उदगम स्थल है, जहां से निकलकर यह नदी आगे चल कर बूढ़ी राप्ती में विलीन हो जाती है। ठंड के मौसम में यह ताल जहां प्रवासी साइबेरियन पक्षियों का सैरगाह बन जाता है। वहीं लेंवड़ ताल की मछलियां लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
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16 साल पहले घोषित पक्षी विहार
डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के लेंवड़ ताल को वर्ष 2009 में पक्षी विहार घोषित किया गया। इसके बाद प्रशासन ने सीमांकन करा कर विकास के लिए करीब दो करोड़ से अधिक धनराशि कर लेंवड़ी और कटरिया बाबू गांव के पास बांध का निर्माण कार्य आरंभ किया। उसी दौरान मत्स्यजीवी समिति के द्वारा ताल को 10 वर्षीय मत्स्य पालन के लिए पट्टा करा लिया गया। पक्षी विहार घोषित होने की जानकारी जब मत्स्यजीवी समिति के लोगों को हुई तो वे हाईकोर्ट चले गए, जहां से पारित स्थगन आदेश के बाद पक्षी विहार के साथ ही अन्य विकास कार्यों पर विराम लग गया।
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पक्षी विहार घोषित करें तो पर्यटन को मिलेगा बढ़ाव
चहक उठूं हो श्रृंगारित, गर सुध ले ले प्रशासन, मैं हूं लेवड़ताल सदा से, देती बहुतों को जीवन..., डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कटरिया बाबू गांव निवासी उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से धर्मवीर भारती पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार डॉ. चंदेश्वर यादव की उक्त पंक्ति लेवड़ ताल के महत्व को समझने के लिए काफी हैं। ताल हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। ये सदा ही हमारे समाज के लिए जीवनदायिनी का कार्य करते हैं। शासन व प्रशासन अगर लेंवड़ ताल को गोरखपुर स्थित रामगढ़ताल की तरह विकसित करें तो पर्यटक को बढ़ावा मिलेगा।पक्षी विहार घोषित होने और सीमांकन तथा चेतावनी बोर्ड लगने के बाद यदि प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन सम्यक ढंग से किया होता तो निश्चय ही क्षेत्र के विकास को पंख लग जाते और लेवड़ ताल जल संरक्षण का अक्षय पात्र बनता।
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आय का प्रमुख साधन बन सकता है ताल
डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कटरिया बाबू ग्राम पंचायत में स्थित लेंवड़ ताल में वर्तमान समय में किसी को पट्टा आवंटित नहीं है। क्षेत्र के मुद्रिका शर्मा, जयश्री जायसवाल, रामरूप चौरसिया बताते हैं कि अगर सरकार लेंवड़ ताल के संरक्षण व विकास को आगे बढ़ाती है तो क्षेत्र के लिए आय का बेहतर विकल्प तैयार हो सकता है। करीब 325 हेक्टेयर में फैले इस ताल से जहां लाखों के तिन्नी चावल मिल जाता है, वहीं राष्ट्रीय पुष्प कमल, कमल गट्टे के साथ ही इसकी मछलियों से प्रति वर्ष करीब 10 लाख से अधिक का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
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बोले जिम्मेदार
325 हेक्टेयर में फैले लेंवड़ ताल का वर्तमान समय में किसी को पट्टा आवंटित नहीं है। वर्ष 2009 में घोषित पक्षी विहार के बारे में जानकारी नहीं है। अगर शासन स्तर या पर्यटन विभाग से इसके संरक्षण व विकास को लेकर जो भी दिशा-निर्देश मिलेगा उसका अनुपालन किया जाएगा।
- रवि कुमार यादव, तहसीलदार डुमरियागंज