- फंदे से लटकने की कोशिश की तो कोई मोबाइल न मिलने से जहर खाकर पहुंचा अस्पताल
- आसान टास्क से शुरुआत, धीरे-धीरे बढ़ता मानसिक दबाव, रिवॉर्ड-दंड सिस्टम से खिलाड़ी को बांधने की रणनीति
- किसी को मत बताओ जैसी शर्तों से आइसोलेशन, नींद, पढ़ाई और सोशल लाइफ पर भी पड़ रहा सीधा असर
सिद्धार्थनगर। गाजियाबाद जनपद में कोरियन गेम की लत का शिकार हुई बहनों की खिड़की से कूदकर जान दे दी। इस घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया। सच्चाई यह है कि यह किसी एक शहर या परिवार की समस्या नहीं रह गई है। जनपद में ऐसे मामले भले ही उजागर नहीं हुए हैं, लेकिन गांव से शहर तक इसका जाल फैला हुआ है। फोन पर पाबंदी, गेम खेलने से मना करने या फिर स्मार्ट फोन खरीद की जिद पूरी न होने पर जिंदगी दांव पर लगाने से भी नहीं हिचक रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में हर माह करीब पांच-छह मामले ऐसे मामले आ रहे हैं, जिसमें मोबाइल गेम की लत का शिकार हुए बच्चों को अभिभावक लेकर पहुंच रहे हैं, जहां दवा-इलाज के साथ उनकी लंबी काउंसिलिंग करनी पड़ रही है।
डिजिटल की दुनिया दिल और दिमाग पर दोनों पर गहरा असर कर चुकी है। खास करके जेन-जी पर इसका नशा हावी है। परिवार से ज्यादा वह डिजिटल गेम और मोबाइल फाेन महत्व दे रहे हैं। कमोबेश हालात यह है कि अगर अभिभावकों की फोन से दूरी बनाने का दबाव बनाते हैं या डांटते-फटकारते हैं तो ऐसी स्थिति में यह किशोर अपनी जिंदगी को दांव पर लगा ले रहे हैं। मेडिकल कॉलेज में इन दिनों औसतन चार से छह मामले ऐसे पहुंच रहे हैं, जिसमें किशोर-किशोरियां जहर खाकर अस्पताल पहुंचे हैं। इसमें जहर खाने तक ही बात सीमित नहीं है, फंदे पर लटकने और कमरे में खुद को बंद कर लेने, जैसे कदम उठाए जाने की बात भी सामने आई है। गाजियाबाद की घटना को समाजशास्त्री, मनोचिकित्सक और विधि विशेषज्ञ बेहद गंभीर और दुखदपूर्ण बता रहे हैं और अभिभावकों को जागरूक होने के साथ ही ऐसे घातक गेम पर पूर्ण पाबंदी लगाने और बच्चों की लगातार निगरानी की सलाह दे रहे हैं, जिससे ऐसी वारदातों को रोका जा सके।
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हर माह आते हैं 20 से 30 मामले
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी के आंकड़ों पर गौर करें तो जहरीला पदार्थ खाने के 20 से 30 मामले पहुंच जाते हैं। इसमें गंभीर बात यह है कि चार-पांच किशोर और किशोरी ऐसे हैं, जिन्होंने मोबाइल फोन को लेकर हुए विवाद, गेम खेलने से रोके जाने, देर रात तक स्क्रीन देखने और ऑनलाइन गतिविधियों पर नियंत्रण की कोशिश के बाद ऐसा कदम उठा लिया। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों के मुताबिक जब परिवार के लोगों ने दबाव बनाया तो इन्होंने आत्मघाती कदम उठा लिया।
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तेजी से गिर रही सेहत
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में मानसिक रोग से पीड़ित लोगों की हिस्ट्री जानने की कोशिश की गई तो यहां बात सामने आई कि कई ऐसे किशोर आ रहे हैं, जिनकी सेहत तेजी से गिर रही है, फिर मोटापे का शिकार हो गए हैं या फिर बहुत अधिक हो गए रहे हैं। इन केसों में अभिभावक की ओर से जानकारी दी जा रही है। चिकित्सकों का कहना है कि माता-पिता की शिकायत है कि बच्चा मोबाइल इस प्रकार से चिपक जा रहा है कि सिर्फ मोबाइल चलने और सो जाने तक ही दिनचर्या सीमित रह गई है। कई बार स्कूल जाने की बात पर लड़ने पर भी उतारू हो जा रहे हैं। न समय से खाना है न सोना है। कई बच्चे तो ऐसे आ रहे हैं जो दिन के दिन कमरे में खुद को कैद कर ले रहे हैं। इनकी उम्र लगभग 12 से 16 साल के बीच है। मानसिक रोग विशेषज्ञ काउंसिलिंग के साथ दवा भी दे रहे हैं, जिससे की उनकी दिनचर्या पहले जैसे हो जाए।
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केस - 1
मोबाइल छीनने पर फंदे से लटकने की कोशिश
बीते वर्ष जोगिया कोतवाली क्षेत्र का रहने वाला एक 14 वर्षीय किशोर इस बात पर जान देने पर उतारू हो गया कि पिता ने उसे खेत जाने के लिए बोल दिया। उस समय वह मोबाइल चलाने में व्यस्त था। पिता ने मोबाइल छीनकर पटक दिया तो आक्रोशित हो गया और बोला कि सब खराब कर दिए। इस कहते हुए पिता से टकरा गया और कमरे में खुछ को बंद करके फंदे से लटकने की कोशिश की। दरवाजा खुला होने की वजह से परिवार के लोगों ने उसे बचा लिया। लगभग दो घंटे इलाज के बाद उसकी स्थिति में सुधार हुआ।
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केस - 2
किशोर ने मां के साथ खुद को पहुंचाया
बीते दिसंबर माह में उसका क्षेत्र एक 15 वर्षीय छात्र ने मां पर हमला कर दिया। साथ ही ब्लड से हाथ की नस को काटने की कोशिश की। इस घटना के पीछे पता चला कि देर रात रात मोबाइल चलाया और विद्यालय नहीं जा रहा था। मां ने मोबाइल छीनकर रख दिया था, इसलिए मां को किसी वस्तु से पैर पर मार दिया था, जिससे उसे चोट आईं। इसके बाद वह खुद को नुकसान पहुंचाने लगा। पिता और भाई मुंबई में थे, मां ही इलाज के लिए लेकर पहुंची थी।
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साइबर दुनिया का दबाव
साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि आज के एप और गेम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर लंबे समय तक जुड़े रहें। लगातार नोटिफिकेशन, रिवॉर्ड सिस्टम और ऑनलाइन पहचान किशोरों को वास्तविक दुनिया से काटने लगती है। जब माता-पिता बिना समझाए सीधे रोक-टोक करते हैं तो यह टकराव को और गहरा कर देता है। कई बार वह मोबाइल के प्रयोग से साइबर क्राइम का शिकार भी हो जा रहे हैं। ब्लैकमेल भी किए जा रहे हैं। अभिभावक को बच्चों के मोबाइल की समय-समय पर निगाह रखनी चाहिए। अपनी निगरानी में फोन चलाने दें। इससे गेम जैसी लत का शिकार होने से बच्चे बच सकते हैं।
दिलीप कुमार द्विवेदी, साइबर एक्सपर्ट साइबर थाना सिद्धार्थनगर
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बोले मनोचिकित्सक
समय सीमा निर्धारित करें : स्कूल के दिनों में गेमिंग को एक घंटे और सप्ताहांत पर 2-3 घंटे तक ही सीमित रखें।
गैजेट मुक्त क्षेत्र : घर में कुछ स्थान और समय (जैसे भोजन की मेज या सोने से पहले) पूरी तरह से मोबाइल और गैजेट मुक्त रखें।
शारीरिक गतिविधियां : बच्चों को बाहरी खेलों (जैसे क्रिकेट, फुटबॉल) या रचनात्मक शौक (जैसे पेंटिंग, संगीत) के लिए प्रोत्साहित करें।
खुला संवाद : बच्चों से उनकी चिंताओं और भावनाओं पर बात करें ताकि वे अकेलेपन को दूर करने के लिए गेमिंग का सहारा न लें।
पैरेंटल कंट्रोल एप : स्क्रीन टाइम को ट्रैक करने और एप को लॉक करने के लिए Google Family Link जैसी तकनीक का उपयोग करें।
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मोइबल गेम की लत के शिकार बच्चे पहुंच रहे हैं। अभिभावक लेकर आते हैं तो उनकी हिस्ट्री के बारे में पता किया जाता है। समस्या कब से है और किसी प्रकार की दिक्कत हो रही है। इसमें चिड़चिड़ा होने, बात पर पर लड़ने, मोबाइल चलाने और सोने, मोबाइल बंद करने के लिए बोलने पर झगड़ जाने यहां तक घातक कदम जैसे खुद को समाप्त करने की कोशिश के मामले में आ रहे हैं। इनकी काउंसिलिंग और दवा के साथ कुछ मोबाइल एप के बारे में जानकारी दी जा रही है, जिससे वे प्रयोग करना बंद कर दें। जैसे बेहतरीन स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट एप गूगल फैमिली लिंक है जो सबसे लोकप्रिय और फ्री है। इसमें आप डेली स्क्रीन लिमिट सेट कर सकते हैं। बच्चे कौन सी एप कितनी देर इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी रिपोर्ट देख सकते हैं। रात में फोन को ऑटोमेटिक लॉक करने का समय तय कर सकते हैं। यह गेमिंग के लिए अलग से समय सीमा तय करने की सुविधा देता है। यू-ट्यूब मॉनिटरिंग और पैनिक बटन जैसे फीचर्स इसमें शामिल हैं।
- डॉ. मो. अफजल खान, विभागाध्यक्ष, मानसिक रोग विभाग, मेडिकल कॉलेज
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बोले विधि विशेषज्ञ
माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को कम से कम मोबाइल का प्रयोग करने दें। अगर कर रहे हैं तो वह पढ़ाई तक सीमित रहे। इसके बाद प्रयोग बंद कर दें। इसमें मां को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही गेम को लेकर कानून बनाने की जरूरत है। जैसे मोबाइल गेम के परीक्षण के बाद ही उसे संचालित करने की अनुमति दी जाए। प्रतिबंध लगाए जाने के संबंध में कानून बनाया जाए। अगर ऐसे गेम नहीं रहेंगे तो इस प्रकार की वारदातों को कम किया जा सकता है।
- संजय कुमार श्रीवास्तव, वरिष्ठ अधिवक्ता अपराध, जनपद न्यायालय