सिद्धार्थनगर। सुबह के करीब आठ बजे हैं। बांसी की रहने वाली रागिनी (42) हाथ में थैला लिए सब्जी मंडी पहुंचती हैं। दुकानदार से पालक या दूसरी पत्तेदार सब्जियों के बजाय लौकी, तोरई, कद्दू और परवल मांगती हैं। साथ में दाल भी लेती हैं। पूछने पर कहती हैं, भादो शुरू हो गया है। घर में इस महीने खानपान थोड़ा बदल जाता है। पहले सुबह दही जरूर खाते थे, अब दही बंद कर दी है। बासी खाना भी नहीं खाते।
यह सिर्फ एक घर की कहानी नहीं है। भादो शुरू होते ही सिद्धार्थनगर में कई परिवारों की रसोई की थाली बदलने लगी है। कहीं दही और बासी भोजन से परहेज है तो कहीं पत्तेदार सब्जियों से दूरी। सात्विक भोजन, व्रत और पूजा-पाठ के कारण बाजार में भी खरीदारी का रुख बदल गया है। इसका असर सब्जी मंडियों में भी दिख रहा है, जहां लौकी, तोरई, कद्दू, परवल और दालों की मांग बढ़ी है।
सब्जी विक्रेता अजय गुप्ता के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में ग्राहकों की पसंद में अंतर आया है। पालक जैसी पत्तेदार सब्जियों की तुलना में लौकी, तोरई, कद्दू और परवल की मांग बढ़ी है। दालों की खरीदारी भी पहले की अपेक्षा बढ़ी है। विक्रेता के अनुसार यह बदलाव धार्मिक मान्यताओं के साथ मौसम को लेकर लोगों की अपनी पसंद से भी जुड़ा है।
आयुर्वेदाचार्य डॉ. राजेश अग्रहरि बताते हैं कि बारिश और उमस के दौरान भोजन आसानी से दूषित हो सकता है। ऐसे में ताजा, हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन लेना बेहतर माना जाता है। दही, बासी भोजन या बहुत भारी भोजन से परहेज की परंपरा को भी इसी मौसम के संदर्भ में समझा जा सकता है।