दो धड़ों में बटें रहे मतदाता, हिन्दू और मुस्लिम का रुख अलग-अलग
कई धड़े में बंटती नजर आईं छोटी जातियां, मैदान से बाहर हो चुकी है बसपा
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। संसदीय सीट डुमरियागंज में कड़े इम्तिहान के बीच शनिवार को हुए मतदान ने नए सियासी समीकरण को जन्म दिया है। इस सीट पर आमने-सामने की सीधी जंग पर जातीय मतों के बिखराव की छाया साफ दिख रही है। मतदान केंद्र से लेकर सड़क तक मतदाता दो धड़ में बंटे हुए दिख रहे हैं।
कुछ खास वर्ग मतों के ध्रुवीकरण का किसे और कहां तक लाभ मिलेगा, मतदान शुरू होने के साथ ही सियासी समीकरण बैठाने वाले राजनीति के पंडित गुणा गणित लगाना शुरू कर दिए हैं। लेकिन मतदाताओं ने खामोशी के साथ अपना फैसला ईवीएम में लॉक कर दिया। जो चार जून को मतगणना के बाद फैसले के रूप में सामने आना बाकी है।
लोकसभा सीट डुमरियागंज कई मायने में अहम है। यहां भाजपा ने दो बार भाजपा और एक बार कांग्रेस तीन बार से लगातार सांसद जगदंबिका पाल को चौथी जीत दर्ज करने के लिए मैदान में उतारा है। सियासत के माहिर खिलाड़ी और पैठ बनाने में महारथ हासिल पाल के सामने इंडी गठबंधन ने पूर्वांचल के बड़़े ब्राह्मण चेहरा पूर्व मंत्री स्वर्गीय हरिशंकर तिवारी को चौथी जीत की गाड़ी को रोकने के लिए मैदान में उतारा है। इसलिए यह सीट पर सभी की निगाहे हैं। पर्चा दाखिला और प्रचार तक समीकरण बनते और बिगड़ते रहे। शनिवार को इम्तिहान की घड़ी आई। जिस पर आमने- सामने की सीधी जंग पर जातीय मतों के बिखराव का साया साफ नजर आ रहा है।
मतदान से बने सियासी समीकरण ने पूरी गुणा और गणित को पलट दिया है। जैसा की शनिवार को मतदान केंद्रों के बाहर चर्चा में सामने आई। चुनावी गुणा गणित लगाने के माहिर राजनीतिक गुरू मतदान के बाद मिल रहे रुझान से बन रहे समीकरण की तह तक जाने में जुटे हैं। लेकिन मतदाता खामोश हैं। उनकी खामोशी से बहुत कुछ निकल तो नहीं पाया है। लेकिन क्षेत्र के हिसाब से मतदाताओं में बिखराव जरूर नजर आया। भाजपा और सपा की आमने-सामने जंग है। क्योंकि बसपा लड़ाई से बाहर है। लेकिन विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से मतों के बिखराव की जो बात निकलकर आ रही है। इसमें तीसरे के रूप में पूर्व विधायक चौधरी अमर सिंह आजाद समाज पार्टी से मैदान में क्षेत्र के हिसाब से इन्होंने भी मतदाताओं को अपने पाले में लाने की पूर्ण कोशिश की है। इसी ध्रुवीकरण की छाया क्या और किस पर असर डालेगी, इसका निष्कर्ष लोग निकाल नहीं पा रहे हैं। हां यह बात जरूर कह रहे हैं कि परिमाण चौंकाने और अप्रत्याशित होगा।
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दलित और सवर्ण मतदाता निर्णायक
जिले में शनिवार को देखी गई मतदान की स्थित से एक बार जरूर निकलकर सामने आई है कि दलित और सवर्ण मतदाता निर्णायक भूमिका में होंगे। क्योंकि हर विधानसभा में बिखराव की बात सामने आ रही है। जबकि मुस्लिम मतदाता खामोश हैं। वह कहां गए, इसके बारे में चुनावी पंडित समीक्षा कर चुके हैं। डुमरियागंज में वरिष्ठ नागरिक रामभुआल ने कहा कि इन दोनों वर्ग के मतदाताओं के ध्रुवीकरण चुनाव में निर्णायक साबित होगी।
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मतदान प्रतिशत मेें गिरावट ने बढ़ा दी बेचैनी
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 52.26 प्रतिशत मतदान हुआ था। जबकि 2014 में 53.09 प्रतिशत मतदान हुआ था। जबकि इस बार प्रशासन की ओर से जारी कि आंकड़ों के मुताबिक इस बार घटकर 51.98 मतदान होने का दावा किया है। प्रशासन के मुताबिक कुछ प्वाइंट में बढ़त हो सकती है। फिलहाल पिछले दो चुनाव की तुलना में मतदान प्रतिशत का कम होना प्रत्याशियों के लिए चुनौती जैसा है। जो सोंचने पर मजबूर कर रहा है। मतदान प्रतिशत का कम होना किसे नुकसान पहुंचाएगा। इसके बारे में राजनीति विषलेश चर्चा शुरू कर दिए हैं।
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श्याम सुंदर तिवारी
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