बुद्ध के क्रीड़ांगन में बचपन खतरे में है। यहां जन्म लेने वाले बच्चों को पर्याप्त पौष्टिक आहार नहीं मिल पा रहा। हालत यह है कि 15895 बच्चे अति कुपोषित हो चुके हैं।
करीब 60 हजार नौनिहाल कुपोषित की श्रेणी में है। यह हाल तब है, जब बचपन बचाने के लिए पूरा तंत्र जोर-शोर से जुटा हुआ है।
तमाम कवायदों और हो-हल्ला के बावजूद बच्चों को खुशहाल बचपन दे पाने में नाकाम हैं।जिले में पांच वर्ष तक के बच्चों की संख्या करीब 3 लाख है। इसमें 75 हजार से अधिक बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं।
इन्हें पर्याप्त पौष्टिक आहार नहीं मिल पा रहा। ऐसे में इन बच्चों की सेहत पर खतरा बरकरार है। तमाम बीमारियां इनके इर्द-गिर्द घूम रही हैं।
सबसे ज्यादा खतरे में नवजात शिशु हैं। मानकों के तहत जन्म लेने वाले बच्चे का न्यूनतम वजन 2 किलो 100 ग्राम तक होना चाहिए, मगर अधिकांश बच्चे इसे भी पूरा नहीं कर पा रहे।
मतलब साफ है कि बच्चों को गर्भ में ही पौष्टिक आहार की पूर्ति नहीं हो रही। कहीं पिछड़ापन कारण है तो ज्यादातर क्षेत्रों में इसका मूल कारण अज्ञानता और जागरूकता की कमी है।
बच्चों की सेहत को लेकर माता-पिता गंभीर नहीं दिखते। नियमित टीकाकरण और पौष्टिक खुराक के अभाव में गर्भ में बच्चों को पोषण नहीं मिल पा रहा। लिहाजा जन्म लेते ही वह खतरों से जूझने को मजबूर हो रहे हैं। कुपोषण के कारण उनका बचपन सामान्य नहीं रह रहा।