तुलसियापुर। जमीन को बंजर होने से बचाने के लिए सरकार ने यूरिया के लिए कोटा सिस्टम को लागू किया है। रबी और खरीफ की फसलों के वक्त छह-छह माह में एक हेक्टेयर पर यूरिया के सात बोरी, एनपीके या डीएपी के पांच बोरी दिए जाने का प्रावधान किया गया। इससे अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं हैं।
धान और गन्ने के इस गढ़ में इस बार पैदावार घटने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। धान की रोपाई और निराई के वक्त जिस यूरिया पर किसान आंख मूंदकर निर्भर थे। वह इस बार मानक से कम मिलेगी और वो भी टुकड़ों में, तपती दोपहरी में यूरिया के एक बोरी के लिए समितियों के चक्कर काटते किसानों की बेबसी इस समय ग्राउंड जीरो पर साफ देखी जा सकती है।
संवाद न्यूज एजेंसी की टीम जब गत दिनों बढ़नी ब्लाॅक के परसा स्टेशन के सहकारी समिति पर पहुंची, तो वहां पड़रिया के किसान राममूरत मिले। तंज और बेबसी भरे लहजे में कहा, इस बार सबको सब पता लग जाएगा। खूब करते थे यूरिया का इस्तेमाल। उन्होंने 1968 में शुरू हुई हरित क्रांति से लेकर अबतक के सफर को एक झटके में समेटते हुए बताया, एक दौर वह था जब सरकार ही गली-गली जबरदस्ती यूरिया भिजवाती थी और लोग खाद लाने वालों को खदेड़ देते थे। फिर लोगों को ऐसी आदत पड़ी कि लोग एक-एक बीघे में एक-एक बोरी यूरिया डालने लगे। अब आज देखिए, उसी एक बोरी के लिए लोग परेशान घूम रहे हैं।
बोले जिम्मेदार
किसान यूरिया यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल करते आए हैं, इसलिए उन्हें समझाकर जैविक खाद के भी इस्तेमाल की ओर बढ़ने के लिए कहा जा रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि ज्यादा यूरिया की आदी हो चुकी जमीन को पहले जितनी न मिलने पर फसल के कमजोर होने का डर है लेकिन अन्य पोषक पदार्थों का उपयोग कर उस कमी को दूर किया जा सकता है।
- राम सेवक, एडीओ(कृषि), बढ़नी