सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से राज्य अध्यापक पुरस्कार की पात्रता और आवेदन प्रक्रिया में किए गए बदलावों को लेकर शिक्षकों में असंतोष बढ़ गया है। सात जून से आवेदन प्रक्रिया शुरू होने जा रही है लेकिन नई शर्तों को लेकर कई शिक्षक इन्हें व्यावहारिक नहीं मान रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि कठोर मानकों के कारण बड़ी संख्या में योग्य और उत्कृष्ट शिक्षक भी दौड़ से बाहर हो रहे हैं।
जानकारों के अनुसार, नए नियमों में केवल वही नियमित शिक्षक राज्य अध्यापक पुरस्कार के लिए पात्र होंगे, जिन्होंने कम से कम 15 वर्ष की सेवा पूरी कर ली हो और उनकी सेवानिवृत्ति में कम से कम 5 वर्ष का समय शेष हो। सिर्फ इस नियम से ही हजारों शिक्षक पुरस्कार की दौड़ से बाहर हो जाएंगे। इसके अलावा शिक्षा मित्र, संविदा शिक्षक, अनुदेशक और सेवानिवृत्त शिक्षक इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर कर दिए गए हैं।
शिक्षक दिनेश कुशवाहा का कहना है कि विभाग ने विद्यालयों के नामांकन को भी पात्रता का आधार बनाया है। प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम 150, उच्च प्राथमिक में 105 और कंपोजिट विद्यालयों में 255 छात्रों का नामांकन अनिवार्य किए गए हैं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में इन मानकों को पूरा करना कठिन है, क्योंकि वहां लगातार नामांकन घट रहा है।
आवेदन प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया गया है। शिक्षकों को अपने कार्य, नवाचार और उपलब्धियों का विवरण मिशन प्रेरणा पोर्टल पर अपलोड करना होगा। ऑफलाइन आवेदन पूरी तरह बंद कर दिया गया है, जिससे तकनीकी रूप से कमजोर शिक्षकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जिलेवार चयन प्रक्रिया के तहत एक जिले से केवल तीन शिक्षकों के प्रस्ताव ही आगे भेजे जाएंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा और अधिक बढ़ गई है।
सेवानिवृत्त शिक्षक रमाकांत शुक्ल के अनुसार शिक्षकों के अनुसार सबसे बड़ी चुनौती नामांकन की अनिवार्य शर्त है। उनका कहना है कि विद्यालय में बच्चों की संख्या कई बार भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है जबकि पुरस्कार का मूल्यांकन शिक्षक के शैक्षिक नवाचार, सीखने के परिणाम और समाज में योगदान के आधार पर होना चाहिए।