प्रधानी चुनाव की नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही गंवई राजनीति पूरे सबाब पर पहुंच गई है। नए परिसीमन के बाद चुनावी क्षेत्र का दायरा भले ही घट गया हो, लेकिन प्रत्याशियों की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं।
दो से तीन गांवों तक सिमटे वोटरों को सहेजने में प्रत्याशियों को पसीने छूट रहे हैं। हर प्रत्याशी से सीधा संपर्क होने के नाते, आमतौर पर राजनीति से दूर रहने वाले मतदाता पसोपेश में हैं। प्रत्याशियों का खुला समर्थन करने वाले कुछ लोगों को छोड़ दें तो ज्यादातर मतदाता खामोशी अख्तियार करना ही बेहतर समझ रहे हैं।
वोट मांगने के लिए घर पहुंचने वाले किसी भी प्रत्याशी को नाराज नहीं करना चाहते। वहीं प्रत्याशियों की बात करें तो वे वोटों को अपने पाले में लाने के लिए हर तिकड़म आजमा रहे हैं।
जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत सदस्य चुनाव के दौरान गांवों में शुरू हुई गुटबाजी अभी थमी ही नहीं थी कि प्रधानी चुनाव की आहट ने गंवई राजनीति को और भी तल्ख बना दिया है। तकरीबन एक हजार वोटरों के चुनावी क्षेत्र में हर प्रधान प्रत्याशी पूरा दम लगाता नजर आ रहा है।
नामांकन प्रक्रिया के दौरान जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, उससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि हर ग्राम पंचायत में औसतन सात से आठ प्रत्याशी ताल ठोंकने को तैयार हैं। हाल ही में हुए जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत चुनाव को देखें तो प्रधानी के चुनाव में साठ से पैंसठ प्रतिशत मतदान की उम्मीद जताई जा रही है।
ऐसे में प्रधान प्रत्याशियों की सारी जंग 600 से 700 मतों को लेकर होगी। इतने कम मतदाताओं के बीच जीत की गणित लगाने में प्रत्याशियों को पसीने छूट रहे हैं।
अधिकतर मतदाताओं की चुप्पी और किसी भी प्रत्याशी को सीधे मना न करने की उनकी रणनीति ने प्रत्याशियों को हलकान कर रखा है। मतदान का दिन पास आने के साथ अब कोई प्रत्याशी अपनी जीत पक्की करने के लिए कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता। इसके लिए हर तरकीब आजमाई जा रही है।
युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए दावतों को दौर चल रहा है और पीने वालों के लिए मयखाने खोल दिए गए हैं। चुनाव के समय प्रत्याशियों द्वारा की जा रही इस खातिरदारी का पीने व खाने वाले जमकर फायदा उठा रहें। किसी भी प्रत्याशी का खुलकर समर्थन करने के बजाय वे भ्रम की स्थिति बनाए रखने में ही अपना फायदा समझ रहे हैं ताकि मतदान से पहले तक वे सारे प्रत्याशियों की दावत-ए-खास का हिस्सा बने रहें।
उन्हें यह अच्छी तरह से पता है कि चार दिन की चांदनी है और फिर अंधेरी रात। मतदान के बाद कौन पूछने वाला है ऐसे में क्यों न सारे प्रत्याशियों की जेब ढीली करा ली जाए। इसके इतर गांवों में रसूख रखने वाले लोग खुद को वोटों का ठेकेदार बताकर प्रत्याशियों को चूना लगा रहे हैं। चुनाव जीतने की लालसा में प्रत्याशी सबकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की हर संभव कोशिश में लगा है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो लोकतंत्र में जनता-जनार्दन की सर्वोच्चता का सबसे बेहतर नजारा इन दिनों गांवों में ही देखने को मिल रहा है।