दिल्ली में रखा पिपरहवा रत्न। श्रोत प्रशासन
- प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर दी जानकारी, सात मई को हांगकांग में होनी थी नीलामी
परमात्मा शुक्ल
सिद्धार्थनगर। कपिलवस्तु के पिपरहवा में खोदाई में निकले पुरातात्विक अवशेषों की 127 वर्ष बाद भारत वापसी हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर यह जानकारी दी है। अंग्रेज अफसर पेपे द्वारा पिपरहवा में 1898 में खोदाई में निकलवाई गईं कलाकृतियों को हांगकांग में नीलाम किया जाना था। पेपे के वंशजों द्वारा इन बौद्धकालीन अवशेषों की नीलामी की जा रही थी। पिपरहवा रत्न के नाम से प्रसिद्ध अवशेषों की केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के प्रयास से भारत वापसी हो गई है।
महात्मा बुद्ध के कुशीनगर में महापरिनिर्वाण के बाद कपिलवस्तु में शाक्यों ने कुछ अवशेषों पर पिपरहवा स्तूप का निर्माण कराया था। भारत के प्रसिद्ध स्थलों में शामिल पिपरहवा स्तूप पूरे विश्व के बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां पर खोदाई में निकले बौद्धकालीन अवशेषों को पहले कोलकाता स्थित संग्रहालय में रखा गया था, जिसे बाद में यहां लाया गया है। इतिहासकारों के अनुसार ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेपे ने वर्ष 1898 में पिपरहवा में खोदाई में निकाली गई कलाकृतियों (अवशेषों) को औपनिवेशिक नीति के तहत अनुमति लेकर अपने पास रखा।
भगवान बुद्ध से जुड़े इन पवित्र अवशेषों जिन्हें पिपरहवा रत्न के रूप में जाना जाता है। पेपे के वंशज हांगकांग में सोथबी नाम की एजेंसी की मदद से सात मई 2025 को नीलाम कराने वाले थे। एजेंसी की वेबसाइट से जानकारी होने पर सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी प्रधानमंत्री के साथ ही अन्य मंत्रालयों को नीलामी रुकवाने के लिए पत्र भेजा था। संवाद