सिद्धार्थनगर। जिले में संचालित होने वाले सरकारी और गैर सरकारी अस्पताल में आग से बचाव के इंतजाम नाकाफी हैं। ऐसे में यदि यहां आग लगी तो लखनऊ के एसजीपीजीआई जैसी घटना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
मंगलवार को चार सीएचसी और माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज की पड़ताल की गई तो व्यवस्था बदहाल मिली। अस्पताल में आग से बचाव के लिए केवल फायर सिलिंडर ही पाए गए। पाइप लाइन की कोई व्यवस्था नहीं की गई तो, जिससे पाइप के जरिए जल्द से जल्द पानी आग वाले स्थल तक पहुंचाया जा सके। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू वार्ड में शार्ट- सर्किट से आग लगी की घटनाएं हो चुकी हैं। जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज में तब्दील होने के बाद यहां पर आग से बचाव के लिए हर वार्ड तक पानी पहुंचाने के लिए पाइप लगाई जा रही है, जिसका काम अभी चल रहा है।
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मेडिकल कॉलेज में पाइप लगाने का चल रहा है काम
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में आग से बचाव के लिए पाइप लाइन पानी की व्यवस्था की जा रही है। इमरजेंसी से लेकर ओपीडी और अन्य वार्ड में पाइप लगाने का कार्य होता हुआ मिला। यहां काम आठ से 10 दिन के भीतर पूरा हो जाएगा। यह जिम्मेदारों का कहना है। मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू वार्ड में आग लगी की घटना घट चुकी है।
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नंबर- दो
पीएचसी में लगी आग से नहीं लिया सबक
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बांसी में चार माह पूर्व रिकार्ड रूम में आग लगी चुकी है। घटना के बाद भी अस्पताल प्रशासन नहीं चेता है। परिसर में न तो पानी की कोई व्यवस्था है और न ही अग्निशमन के यंत्र लगे है। पीएचसी बांसी को तीन वर्ष पूर्व उच्चीकृत कर 50 बेड के अस्पताल का दर्जा दिया गया। अस्पताल में ओपीडी में प्रतिदिन ३०० से अधिक मरीज आते हैं। यहां प्रसव की भी सुविधा है। लेबर रूम में प्रतिदिन चार से छह प्रसूता महिला भर्ती होती हैं और वार्ड में दस से बारह मरीज भर्ती हो रहे हैं। अगर यहां आग लगी की घटना होती है तो बड़ी हानि होगी। कारण आग से बचाव पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस संबंध में पीएचसी बांसी के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. आरके सिंह ने पूछे जाने पर बताया कि पूरे परिसर में आग से निपटने के लिए अग्निशमन विभाग के निर्देशानुसार पाईप लगी है। लेकिन भवन का निर्माण अधूरा होने के कारण यह सिस्टम अभी चालू नहीं है।
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नंबर-तीन
पांच फायर सिलिंडर से बुझाएंगे आग
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिरसिया में प्रति दिन तीन से पांच प्रसव होता है। वहीं ओपीडी में 100 से 150 मरीज आते हैं। क्षेत्र के ५० से अधिक गांव की आबादी के लोग इलाज के लिए यहां पर आते हैं। अस्पताल के वार्डों में प्रसव कक्ष व दवा वितरण कक्ष सहित कुल पांच अग्नि समन सिलिंडर लगा हैं। वह भी सबसे छोटा चार किलोग्राम का। जनरल वार्ड, जेई वार्ड सहित अन्य जग हो पर आग से सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। अस्पताल परिसर में, बोरिंग पानी भरे हौज य पाइप लाइन रेग्यूलेटर आदि की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में अगर आग लगी की घटना हो जाए तो बुझा पाना मुश्किल होगा।
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नंबर- चार
आग से बचाव के लिए केवल 12 फायर सिलिंडर
सामुदायिक स्वास्थ्य बेवां में प्रतिदिन दो से चार प्रसव होता है। वहीं 150-२०० मरीज ओपीडी में आते हैं। इस अस्पताल में भी सीएचसी सिरसिया की तरह आग से सुरक्षा के लिए सबसे छोटा चार किलो ग्राम का 12 अग्निशमन सिलेंडर लगा है। परिसर में पानी का हौज, बोरिंग व पाइप लाइन रेग्यूलेटर की कोई व्यवस्था नहीं है।
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नंबर-पांच
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शोहरतगढ़ में नेपाल से भी मरीज इलाज के लिए आते हैं। मंगलवार को 250 मरीज ओपीडी के लिए आए थे। अस्पताल में के सभी ओपीडी कक्ष में चिकित्सक ओपीडी करते हुए पाए गए। प्रसूता कक्ष में तीन प्रसूता महिला भर्ती मिलीं। अग्निशमन के उपकर अस्पताल परिसर में चार टंगे हुए मिले। लेकिन सभी अग्निशमन धूल फंाक रहे हैं। आपात काल में यह अग्निशमन के उपकरण किस तरह उपयोग होंगे। इसकी जानकारी किसी को नहीं है। इस संबंध में सीएचसी अधीक्षक ने बताया अग्निशमन के उपकर लगाए गए है। सभी की डेट बैलीड हैं। मरीजों की बेहतर सुविधा के लिए दवाओं भंडार किया गया है। सभी चिकित्सक समय से मरीजों की ओपीडी कर रहे हैं।
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निजी अस्पतालों का बुला हाल
आकड़ों के मुताबिक जिले में 60 से अधिक निजी हास्पिटल, अस्पताल और क्लिनिक और अस्पताल पंजीकृत हैं। यहां पर ऑपरेशन के साथ ही ओपीडी, ऑपरेशन और मरीजों को भर्ती करके इलाज किया जाता है। लेकिन यहां पर आग से बचाव कोई प्रबंध नहीं है। केवल फायर सिलिंडर रखे हैं वह भी एक दो। नगर में कुछ अस्पताल मुख्य मार्ग से हटकर अंदर संचालित हो रहे हैं। यहां पर अगर लगती है तो बचा पाना मुश्किल होगा। कारण फायर की बड़ी गाड़ी जाने के लिए रास्ता तक नहीं हैं।
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हर सीएचसी, पीएचसी पर केवल फायर सिलिंडर की व्यवस्था
आकड़ों के मुताबिक जिले में 12 सामुदायिक स्वास्थ्य केंंद्र हैं। जबकि 60 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं और 278 उप स्वास्थ्य केंद्र बने हैं। इसमें सीएचसी और पीएचसी पर नियमित मरीज भर्ती होते हैं और ओपीडी चलती है। जबकि उप स्वास्थ्य केंद्र पर केवल ओपीडी चलती है। लेकिन आग से बचाव के नाम पर सभी पर केवल फायर सिलिंडर ही लगा हुआ है। जो आग से बचाव के लिए नाकाफी है।
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अग्रिशमन विभाग के एनओसी के बाद बनता है लाइसेंस
जानकारों के मुताबिक किसी भी अस्पताल और हास्पिटल बनाने से पहले अग्निशमन विभाग की एनओसी लेना होता है। इसके बाद ही लाइसेंस जारी होती है और संचालन की अनुमति मिलती है। लेकिन संचालन की बात करें तो केवल फायर सिलिंडर ही लगा देते हैं। कहीं हाईडेंट की व्यवस्था नहीं है।
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सभी सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी को निर्देश दिया गया है कि वह आग से बचाव के लिए इंतजाम को सही कर लें। फायर सिलिंडर को देख ले और जरूरत के अनुसार उसकी व्यवस्था करें। इसके साथ ही निजी अस्पतालों की भी व्यवस्था की पड़ताल की जाएगी। जहां व्यवस्था सुविधा नहीं रहेगी, उन अस्पताल संचालकों को निर्देशित किया जाएगा।
डॉ. नरेंद्र कुमार बाजपेयी, मुख्य चिकित्साधिकारी
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मेडिकल कॉॅलेज में फायर सिलिंडर की व्यवस्था है। आग से बचाव के लिए अब हर वार्ड तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। मेडिकल कॉलेज में पाइप बिछाने का काम लगभग पूरा हो चुका है।
-डॉ. एके झा, प्राचार्य माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज