घोसियारी क्षेत्र में गेहूं की कटाई करते कंबाईन मशीन। संवाद
सिद्धार्थनगर। खेतों में कंबाइन मशीनों की गूंज इन दिनों कटाई की रफ्तार जरूर बढ़ा रही है, लेकिन यह रफ्तार एक नए संकट को भी जन्म दे रही है। जिले के अधिकांश खेतों में बिना रीपर (स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम) वाली कंबाइन मशीनों से कटाई हो रही है, जिसके कारण खेतों में फसल अवशेष की मोटी परत बच रही है। नतीजा किसानों की लागत बढ़ रही है, अगली बुवाई में देरी हो रही है और कई मामलों में यही पराली आग की वजह भी बन रही है।
स्थिति यह है कि कंबाइन मशीनें फसल काटकर आगे बढ़ जाती हैं, लेकिन पीछे खेत में बचे डंठल और भूसा इस कदर फैला रहता है कि सीधे बुवाई करना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे में किसानों को या तो खेत की दोबारा जुताई करानी पड़ती है या फिर महंगे उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है। दोनों ही स्थिति में खर्च बढ़ता है। शोहरतगढ़ ब्लॉक के एक किसान बताते हैं कि कंबाइन से कटाई कराने पर 1500 से 2000 रुपये प्रति बीघा खर्च आता है, लेकिन बाद में खेत साफ करने में 2-3 हजार रुपये और लग जाते हैं। अगर रीपर लगा होता तो यह खर्च बच जाता।
इसी तरह बांसी क्षेत्र के एक अन्य किसान कहते हैं, समय कम होता है, अगली फसल की बुवाई करनी होती है, ऐसे में कई लोग मजबूरी में खेत में आग भी लगा देते हैं।
मशीन ऑपरेटरों की अपनी दलील है। एक कंबाइन चालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, रीपर या स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम लगवाने में लागत ज्यादा आती है और मशीन की स्पीड भी कम हो जाती है।