ऐसी मान्यता है कि त्रेता युग में श्रीराम रावण युद्ध के दौरान जब मेघनाथ लक्ष्मण पर वीरघातिनी शक्ति बाण का प्रयोग किया और लक्ष्मण मूर्च्छित हो गए थे। सुषेन वैद्य के कहने पर हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्ग से लौट रहे थे, तो इसी स्थल पर पूजा कर रहे भरत ने अयोध्या का कोई शत्रु समझ कर बाण चला दिया था। बाण लगने से हनुमान जी पर्वत के साथ वहीं गिर पड़े थे, जिससे उक्त स्थल पर सरोवर का उदय हुआ था।
एक अन्य मान्यता यह भी है कि महाराज दुष्यंत के पुत्र भरत ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। इस कारण इसका नाम भारतभारी पड़ा, जो बहुत बड़े नगर के रूप में स्थापित हुआ था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, राम रावण युद्ध में जब रावण के वध के लिए श्रीराम पर ब्रह्म हत्या आरोप लगा था।
कोई पुरोहित उसके निवारण के लिए तैयार नहीं हुआ तो गुरु वशिष्ठ ने कन्नौज से दो बालकों को अयोध्या लाकर जनेऊ कराकर यज्ञ पूर्ण कराया तब उनका ब्रह्म हत्या दोष दूर हुआ। लेकिन वापस घर जाने पर बालकों को उनके घर वालों ने त्याग दिया। फलस्वरूप वे पुन: वशिष्ठ जी से मिले तब श्रीराम ने बाण चला कर कहा कि जहां यह बाण गिरे, वहीं अपना निवास स्थान बना कर जीवन व्यतीत करें। वह बाण भारतभारी में गिरा, जिससे इस विशाल सरोवर का निर्माण हुआ।
यूनाइटेड प्राविंसेज ऑफ अवध एंड आगरा के खंड 32 वर्ष 1907 के पृष्ठ 96,97 पर इस स्थल का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1875 में भारतभारी में आयोजित कार्तिक पूर्णिमा के मेले में 50 हजार दर्शनार्थी शामिल हुए थे। भारतभारी निवासी अधिवक्ता रमेश पांडेय ने बताया कि भारतभारी को लेकर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (आरकोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) 1996-97 के अनुसार, कुषाण कालीन सभ्यता का प्रमाण भी मिला है। सरकार को भारतभारी को प्रमुख पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना चाहिए ताकि भारतभारी को लेकर पूरी दुनिया के लोग जानकारी हासिल कर सके। प्रयागराज के प्रसिद्ध कुंभ मेले की तरह यहां के कार्तिक पूर्णिमा के मेले में भी प्रशासन को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।
गोरखपुर विश्वविद्यालय में संरक्षित हैं यहां पर मिले अवशेष
कई वर्ष पूर्व बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर सतीश चंद्र व एसएन सिंह सहित गोरखपुर विश्वविद्यालय के डॉ. कृष्णा नंद त्रिपाठी ने भारतभारी का स्थलीय निरीक्षण करके मूर्तियों, धातुओं पुरा अवशेषों के अवलोकन के बाद टीले के नीचे एक समृद्ध सभ्यता होने की बात कही थी। लोगों का कहना है कि भारतभारी में प्राचीन टीले व कुएं के नीचे दीवारों के बीच में खुदाई के दौरान कहीं-कहीं लगभग आठ फीट लंबे नर कंकाल मिलते हैं, जो छूते ही राख में तब्दील हो जाते हैं। शोधकर्ताओं द्वारा भारतभारी से ले जाए गए अवशेषों को गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के संग्रहालय में संरक्षित किया गया है। इसे वहां पर देखा जा सकता है।