-मोहर्रम को लेकर ताजिया निर्माण में जुटे कारीगर, 28 से शुरू होगा मोहर्रम
-मुख्य आकर्षण का केंद्र होंगे हल्लौर में बड़ा इमामबाड़ा चौक का 27 फीट ऊंचा ताजिया
संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। जिले के शिया बाहुल्य कस्बा हल्लौर की ताजियादारी देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है। मोहर्रम पर रखी जाने वाली ताजिया बनाने में कारीगर जुटे हैं। मोहर्रम करीब आने से ताजिया बनाने में तेजी आ गई है। कारीगर दिन रात इस काम में लगे हैं। छोटे-बड़े तमाम ताजियों को मोहर्रम की नौ तारीख को चौक पर रखा जाएगा। इस बार मोहर्रम 27 जून से शुरू हो रहा है।
डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कस्बा हल्लौर में सबसे बड़ा और आकर्षण का केंद्र वक्फ शाह आलमगीर सानी कमेटी का बड़ा ताजिया होता है। इसकी ऊंचाई 27 फीट होती है। इस ताजिए को बड़ा इमामबाड़ा में हर साल चौक पर रखा जाता है। बड़े ताजिया को बनाने वाले मुख्य कारीगर राजू रिजवी शिद्दत से जुटे हैं। उनके साथ राशिद रिजवी, जीशान, कासिफ, शीबू और मोजिज आदि की टीम ताजिया की सजावट व बनाने में साथ दे रही है।
ताजिया की लागत 30 हजार से ऊपर होती है। इस ताजिया का निर्माण मोहर्रम के एक पखवाड़ा पहले शुरू हो जाता है। बड़े ताजिए को देखने और सिर झुकाने के लिए गैर जनपदों के लोग आते हैं। राजू रिजवी ने बताया कि बड़े ताजिया में चार खंड होते हैं, जिसमें सबसे पिछले खंड को बहरी, दूसरे खंड को आठवास, तीसरे खंड को चौरस तथा सबसे ऊपरी हिस्से पर गुंबद होता है। ताजिया में सबसे कठिन काम गुंबद और अठवास बनाना होता है। जिस पर कुरान की आयत लिखी जाती है।
ईरानी नक्काशी की झलक
हल्लौर में मोहर्रम के मौके पर बनाए जाने वाले छोटे बड़े ताजियों में ईरानी नक्काशी दिखाई देती है। ताजियों पर कुरान की आयतों को कागजों पर छापकर लगाया जाता है। साथ ही रंग-बिरंगे कागजों से ताजियों को सजाया जाता है, जिससे ताजिए की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। कारीगरों की कशीदाकारी यानी उनकी कला साफतौर से दिखाई देती है।