सिद्धार्थनगर। जिले के बाजारों में सुबह के वक्त चहल-पहल तो है लेकिन ढाबों और होटलों के बाहर पहले जैसी खुशबू और भीड़ गायब है। कई जगह शटर आधे गिरे हैं तो कहीं किचन के दरवाजे बंद पड़े हैं।
गैस के बिना उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। ऐसे कई किचन पूरी तरह ठंडे पड़ चुके हैं, जहां रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा था। कुछ होटल-ढाबे जो चल रहे हैं,उनमें भी मीनू आधे कर दिए गए हैं।
जिन रेस्टोरेंट में पहले दिनभर कड़ाही चढ़ी रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। शहर के कुछ बड़े होटल और ढाबे, जहां कोयले की भट्ठी जलाने की गुंजाइश है, वे किसी तरह आधे-अधूरे तरीके से चल रहे हैं। यहां मेन्यू सीमित कर दिया गया है। तली-भुनी चीजें कम हो गई हैं और ग्राहक भी गिने-चुने नजर आते हैं। इसके उलट, घनी बस्तियों में स्थित छोटे ढाबों और होटलों की हालत और खराब है।
होटल फिरंगी, बीएसए कार्यालय के सामने, सनई चौराहे के कई होटल बंद हैं। चाइनीज फास्ट फूड की कई दुकानें चलाने वाले चंद्र प्रकाश कहते हैं कि वह तीन कॉमर्शियल सिलिंडर इस्तेमाल करते थे। अब एक भी नहीं मिल रहा है, जिसके कारण दुकान बंद करनी पड़ी।
व्यापारी कहते हैं कि गैस की यह किल्लत अब सिर्फ एक सुविधा की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह रोजमर्रा की जिंदगी और छोटे कारोबार की धुरी को प्रभावित कर रही है। जब तक आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक रसोई की यह ठंडी आंच और कतारों में सिमटी उम्मीदें यूं ही बनी रहने की आशंका है।
जिले में 125 पेट्रोल पंप, 45 गैस एजेंसी : शहर समेत जिले के सभी पांच तहसीलों में 125 पेट्रोल पंप और 45 गैस एजेंसियां है। वहीं, जिले में गैस सिलिंडर के 2.17 लाख उज्ज्वला कनेक्शन और तीन लाख सामान्य कनेक्शन धारी है।
पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के पहले तक लोगों को आसानी से गैस सिलिंडर की होम डिलीवरी मिलती रही और गैस एजेंसियों पर इक्का-दुक्का ही उपभोक्ता पहुंचते थे जबकि युद्ध के बाद जिले के विभिन्न गैस एजेंसियों पर एक सप्ताह से उपभोक्ताओं की कतार लगने लगी हैं।