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Siddharthnagar News: विलुप्त हो चुके कुओं को मिलेगा नया जीवन... जल संरक्षण में बनेंगे मददगार

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बिस्कोहर के नगर पंचायत अध्यक्ष ने कुओं को संरक्षित करने की शुरू की मुहिम
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अभी तक एक दर्जन से अधिक कुओं के चबूतरे के निर्माण के साथ ही करवा चुके हैं सुंदरीकरण

संतोष कौशल

बिस्कोहर।
कुएं कभी लोगों की प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण माध्यम थे, लेकिन समय के साथ-साथ इनका अस्तित्व खत्म होता गया। अब गायब कुओं की तलाश कर उसके सुंदरीकरण की मुहिम बिस्कोहर नगर पंचायत अध्यक्ष ने शुरू की है। नगर पंचायत में मौजूद ऐसे कुओं को चिह्नित किया जा चुका है। सुंदरीकरण के साथ ही ये कुएं जल संरक्षण का भी माध्यम बनेंगे।

बिस्कोहर को कभी कुओं का कस्बा कहा जाता था। लेकिन आज ज्यादातर कुएं संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो चुके हैं। भू-गर्भ जलस्तर बनाए रखने और बरसात के पानी को संरक्षित करने में इन कुओं का महत्वपूर्ण रोल होता है। तालाबों के सुंदरीकरण के साथ ही पहली बार बड़ी संख्या में गांव देहात तक रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाए जा रहे हैं। ऐसे में विलुप्त हो चुके कुओं को संरक्षित कर जल संरक्षण के काबिल बनाने का बीड़ा बिस्कोहर नगर पंचायत अध्यक्ष अजय गुप्ता ने उठाया है।
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बिस्कोहर में विलुप्त हो चुके या गायब होने की कगार पर पहुंच चुके कुओं की तलाश शुरू उन्हें चिह्नित करवा कर उसका चबूतरा और सुंदरीकरण का काम युद्ध स्तर पर करवाया जा रहा है। अजय ने बताया कि नगर पंचायत में उनके द्वारा अभी तक करीब 20 कुओं को संरक्षित किया जा चुका है। शेष को भी चिह्नित किया जा रहा है। कहा कि बरसात के पानी को संरक्षित करने के लिए हर स्तर पर प्रयास जारी है, जिन कुओं पर अतिक्रमण हो रहा है, उसकी शिकायत वह शासन स्तर से कर अतिक्रमण मुक्त करवाएंगे।



365 मंदिर और कुओं वाला नगर है बिस्कोहर


बिस्कोहर काफी पुराना और धार्मिक व ऐतिहासिक कस्बा है। यहां 365 कुएं और मंदिर हैं। मगर समय बीतने के साथ-साथ इनका अस्तित्व भी समाप्त हो रहा है। उतने मंदिर व कुएं अब देखने को नहीं मिलते, मगर उसके साक्ष्य अब भी मौजूद हैं। मान्यता है कि यहां भोर से ही सभी शिवालयों के घंटे बजने लगते थे और महादेव के जयकारे से वातावरण गूंज उठता था। वर्तमान में इसकी पहचान थोड़ी धूमिल भले हो गई है, मगर ऐसा भी समय था। जब बंगाल, कलकत्ता, दिल्ली, मुंबई, नेपाल के कोने-कोने से यहां आकर लोग साल साल भर रहते थे। वह मंदिरों में पूजा करते थे। वर्ष पूरा होने पर वह यहां से चले जाते थे। तमाम श्रद्धालु तो यहीं के निवासी हो गए और अपना कारोबार करने लगे।



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जिस कुएं से स्नान करते थे उसी के जल से मंदिर में करते थे जलाभिषेक



मान्यता थी श्रद्धालु एक कुएं के पानी से स्नान करें और फिर वहीं से जल भर मंदिर में जलाभिषेक करें। दूसरे दिन ऐसा ही दूसरे मंदिर पर करें। साल भर में 365 मंदिरों की परिक्रमा पूरी हो जाती थी और ऐसा करने वाले को इच्छित फल मिलता था। तमाम कुष्ठ व असाध्य रोगियों को अपनी पीड़ा से मुक्ति मिती और बाद में कस्बे का नाम बिस्कोहर पड़ा।
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मंदिरों और कुओं की स्थापना कब हुई.. नहीं पता



मंदिरों की स्थापना यहां कब हुई इसके विषय में लोग ठीक से बता नहीं पाते हैं। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने कर वसूलने के लिए यहां जमींदार नियुक्त किए। उनके द्वारा भी कस्बे के दक्षिणी हिस्से में कुछ मंदिरों का निर्माण कराया गया। कस्बे के पश्चिम स्थित एक मंदिर ऐसा है, जिस पर अलाउद्दीन खिलजी के नाम का जिक्र है। इससे यह माना जाता है कि शायद वह मंदिर उसी ने बनवाया हो।
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