जिले के 155 गांवों का पानी लोगों की सेहत के लिए जहर बन चुका है। इन गांवों में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम का खतरा सर्वाधिक है। स्वास्थ्य विभाग ने इन गांवों को एईएस के डेंजर जोन में शामिल किया है।
स्वास्थ्य विभाग ने सर्विलांस सिस्टम के आधार पर इन गांवों का चयन किया है। अब इन्हीं गांवों पर फोकस कर इंसेफेलाइटिस की रोकथाम की कवायद को तेज किया जा रहा है।
दूषित पेयजल के सेवन से होने वाले एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम जानलेवा है। जागरुकता के अभाव में जिले में इसका दायरा तेजी से बढ़ रहा है। कम गहराई वाले हैंडपंपों के पानी का इस्तेमाल कर लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के सर्विलांस सिस्टम ने वर्ष 2008 से 2014 तक सामने आए इंसेफेलाइटिस के मामलों का अध्ययन किया तो जिले के 155 गांवों की स्थिति बेहद खतरनाक मिली। इन गांवों से हर साल मरीज सामने आ रहे हैं।
इस रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने जिले 14 ब्लॉकों के 155 गांवों को एईएस के अंति संवेदनशील यानि डेंजर जोन में शामिल किया है। इसमें सर्वाधिक 21 गांव नौगढ़ व शोहरगढ़ ब्लॉक के संयुक्त रूप से हैं।
दूसरे नंबर पर उसका और लोटन ब्लॉक है। इन ब्लॉकों से संयुक्त रूप से 20 गांव शामिल हैं। इनके अलावा इटवा के 8, भनवापुर के 9, खुनियांव के 7, बांसी के 13, मिठवल के 16, खेसरहां के 15 गांव शामिल हैं।
इस संबंध में सीएमआे डॉ. अनीता सिंह ने बताया कि वर्ष 2008 से 2014 तक आए मामलों की पड़ताल के दौरान 155 गांव एईएस के अति संवेदनशील क्षेत्र में चिह्नित किया गया है। इन गांवों में रोकथाम के लिए कवायद की जा रही है।