सिद्धार्थनगर। जिले के प्रमुख जल संसाधनों और जैविक धरोहरों में से एक मझौली सागर को रामसर साइट के रूप में विकसित करने की योजना है। इस क्रम में डीएम शिवशरणप्पा जीएन ने बुधवार को सिद्धार्थ विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कविता शाह के सुझाव पर मझौली सागर का निरीक्षण किया।
जिला प्रशासन और विश्वविद्यालय की टीम ने सागर के चारों ओर विस्तार से अध्ययन किया। डॉ. वर्मा ने बताया कि प्रारंभिक अध्ययन में मझौली सागर में 143 वनस्पति प्रजातियां और 30 पक्षियों की प्रजातियां दर्ज की गई हैं। अध्ययन के आधार पर यह पाया गया कि सागर को रामसर साइट, कैटेगरी बी के तहत सूचीबद्ध किया जा सकता है। हालांकि इसके लिए और विस्तृत और गहन अध्ययन की आवश्यकता है।
निरीक्षण के दौरान अधिशासी अभियंता ड्रेनेज खंड ने सागर की जल संचयन क्षमता बढ़ाने के लिए डि-सिल्टिंग परियोजना का उल्लेख किया। उनका कहना था कि सागर का जलस्तर बढ़ाने और इसे वर्षा जल और नदियों के प्रवाह के अनुसार समायोजित करने की योजना बनाई जा रही है। यह परियोजना न केवल जल संरक्षण में मदद करेगी बल्कि आसपास की सिंचाई व्यवस्था को भी अधिक प्रभावी बनाएगी।
डीएम ने बताया कि मझौली सागर का रामसर साइट के रूप में विकास केवल जल संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इससे जैविक विविधता, पक्षियों की सुरक्षा और इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने संबंधित विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हुए कहा कि परियोजना को समय-बद्ध तरीके से लागू किया जाए।
परियोजना में शामिल विभाग वन विभाग, सिंचाई विभाग और पर्यटन विभाग की टीम मिलकर कार्य करेगी। इस दौरान सागर के आसपास के पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन भी किया जाएगा ताकि पर्यटन और संरक्षण दोनों संतुलित रूप से विकसित हों। परियोजना के पूरा होने के बाद मझौली सागर धरोहर के रूप में पहचाना जाएगा।