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Siddharthnagar News: बनेगी ई-टेस्टिंग लैब, कालानमक पर होगा शोध

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जिला कृ​षि अ​धिकारी कार्यालय।
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संवाद न्यूज एजेंसी
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सिद्धार्थनगर। गौतम बुद्ध के प्रसाद के रूप में पहचान बन चुके कालानमक धान और चावल की गुणवत्ता पर उठने वाले सवाल का वैज्ञानिक समाधान ढूढेंगे। साथ ही प्रजाति के संकट से जूझ रहे कालानमक धान को असली पहचान और मूल प्रजाति को बढ़ावा देने का काम करेंगे।
इसके लिए दिल्ली और वाराणसी जाने की जरूरत नहीं होगी। जिले में ही कालानमक धान पर रिसर्च हो सकेगा। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में बनेगा ई टेस्टिंग लैब बनेगी।
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यह बायोटेक्नोलॉजी विभाग में संचालित होगा। इस पर 2.12 करोड़ की लागत से होगा काम होगा। सीमावर्ती इलाका होने के साथ यह क्षेत्र कालानमक का मूल केंद्र माना जाता है।
यहां लैब के अस्तित्व में आने के बाद धान की असली क्वालिटी किसानों के पास होगी तो उसका विस्तार होगा। असली प्रजाति होने से गुणवत्ता पर सवाल नहीं उठेगा और किसानों को लाभ मिलेगी। रकबे के आंकड़ों के बात करें तो जिले में 13-15 हजार हेक्टेयर में कालानमक धान की खेत होती है।
प्रदेश के तराई क्षेत्र में सिद्धार्थनगर की गिनती होती है। यहां के कालानमक धान का चयन प्रदेश सरकार की ओर से एक जनपद-एक उत्पाद में शामिल किए जाने के बाद काम शुरू हुआ। लगातार घट रहे रकबे में बढ़त तो हुई, लेकिन किसानों को बाजार और दाम नहीं मिल पा रहा है। बीच में छोटे और बड़े कद के भेद और चावल की खुशबू और गुणवत्ता पर सवाल खड़ा होने लगा।
किसान उत्पादन तो कर रहे हैं, लेकिन लागत के हिसाब से उन्हें भाव नहीं मिल पा रहा है। कुछ लोग उसी चावल की ब्रांडिंग करके महंगे दाम पर बेच रहे हैं।
वहीं, किसान जो लागत खर्च कर चुका है, उसके अनुरूप भी उसे कीमत देने वाले नहीं हैं। इस सबके पीछे चावल की गुणवत्ता की बात आ जाती है।
चावल की गुणवत्ता बनी रहे और मूल प्रजाति जो पहले पाई जाती है, जिसमें खुशबू के साथ गुण औ तत्व पाए जाते हैं। उसके लिए अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र वाराणसी और बीज अनुसंधान केंद्र पूसा नई दिल्ली में कई प्रजाति के कालानमक धान पर शोध किया जा रहा है।
रिसर्च और सुलभ हो, इसके लिए जिले में ही दिल्ली और वाराणसी की तर्ज पर ई-टेस्टिंग लैब रिसर्च सेंटर बनाने की कवायद शुरू की गई।
यह ई-टेस्टिंग लैब सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में बनेगी। एक प्रकार से यह क्षेत्र का कालानमक गढ़ माना जाता है। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध की क्रीड़ा स्थली से इसी क्षेत्र के कालानमक धान का विस्तार हुआ था।
मौजूदा समय में गुणवत्ता और प्रजाति पर सवाल है। इस पर विराम लगाने और मूल प्रजाति के विस्तार के लिए काम शुरू हाे गया है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि जब ई-टेस्टिंग लैब यहां रहेगी तो वैज्ञानिक फसल और जलवायु के हिसाब से उस पर सही से काम कर सकेंगे। ताकि क्वालिटी में दिक्कत न हो। क्योंकि दिल्ली-वाराणसी से आने और लेकर जाने में कई प्रकार की दिक्कत होती है।
इस सेंटर को बनाने के लिए कृषि भवन के पीछे जमीन चिह्नित कर ली गई है। लगभग तीन करोड़ रुपये में लैब तैयार होगी। इसके लिए कागजी कार्रवाई पूरी हो गई है। बजट आवंटित होते ही इस पर काम शुरू हो जाएगा।
तीन वैज्ञानिक सहित 10 लोगों की टीम करेगी पूरे साल काम: विभाग से जुड़े जिम्मेदारों के मुताबिक टेस्टिंग लैब में पूरे साल धान, चावल सकी गुणवत्ता पर जांच होती रहेगी। इसके साथ ही धान में लगने वाले रोग के बारे में भी जांच की जाएगी।
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लैब में चावल और धान की गुणवत्ता सुधार के लिए और समस्या के समाधान पर काम होगा। 10 सदस्यों की टीम इस पर काम करेगी। इसमें तीन कृषि वैज्ञानिक और सात अन्य सहायक के रूप में काम करेंगे। जरूरत पड़ने पर यह टीम खेत तक भी जाएगी।
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