प्रदेश सरकार ने भले ही जिले को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया हो, मगर किसानों को इसका कोई खास लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा। दरअसल, जिला प्रशासन की रिपोर्ट में सूखे से क्षति 30 प्रतिशत से भी कम दर्शाया गया है।
केंद्रीय मानकों के तहत सूखा राहत पाने के लिए 33 फीसदी या इससे अधिक की क्षति होनी चाहिए। ऐसे में सूखा राहत को लेकर किसान असमंजस में है।
जिला प्रशासन को अभी शासन के दिशा-निर्देश का इंतजार है। जिले में 1.79 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में खरीफ फसलों की खेती हुई थी। इसमें सबसे ज्यादा रकबा धान का है। धान का उत्पादन सितंबर में होने वाली बारिश पर निर्भर करता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक सितंबर में अच्छी बारिश हुई, तभी धान की पैदावार भी संभव है।
जिले के हाल पर गौर करें तो इस बार सितंबर में सिर्फ नाम मात्र की ही बारिश हुई है। पूरे महीने में केवल 5 एमएम वर्षा से फसलों पर बुरा असर पड़ा है।
वही किसान फसल बचाने में कामयाब रहे हैं, जिनके पास सिंचाई के निजी संसाधन थे। इटवा, बांसी, नौगढ़ तहसील के गांवों में स्थिति सबसे खराब है।
जमीनी हकीकत चाहे जो भी हो, मगर प्रशासन की सर्वे रिपोर्ट इससे अलग है। जिला प्रशासन की ओर से शासन को भेजी गई प्राथमिक सर्वे रिपोर्ट में सूखे से हुई क्षति 30 फीसदी से भी कम दर्शाई गई है।
हालांकि बारिश के आंकडे़ औसत के 60 फीसदी से भी कम है। किसान समझ नहीं पा रहे कि जब बारिश ही नहीं हुई तो फसल बची कैसे।
किसान बेसब्री से सूखा राहत के रूप में मिलने वाली सहायताओं पर आशान्वित हैं, मगर 30 फीसदी से कम की क्षति की रिपोर्ट से उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता दिख रहा है। सिद्धार्थनगर के अपर जिलाधिकारी पीके जैन ने बताया कि कम वर्षा का असर जिले की खेती पर पड़ा है। प्राथमिक सर्वे में 30 फीसदी से कम की क्षति सामने आई है। इसी की रिपोर्ट शासन को भेजी गई थी। सूखा राहत के तहत किसानों को क्या लाभ मिलेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। गाइड लाइन आने का इंतजार है।