इटवा क्षेत्र में शाहिदा का परिवार बेघर हुआ।
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मंझरिया गांव में आग की तबाही को 72 घंटे बीत गए हैं। बेघर हुए सौ परिवारों के पास अब तक रहने का ठिकाना नहीं है। गांव में गिनती के बचे मकान में कोई आसरा लिए हुए है तो कुछ पॉलीथिन की छत तानकर गुजारा कर रहे हैं।
जीवन भर की कमाई गंवाने वालों को सरकारी मदद के रूप में 41 सौ रुपये मिले हैं। दो जून की रोटी को तरसते परिवारों में अब जितना क्षोभ कुदरत के कहर से नहीं है, उससे कहीं अधिक नाराजगी व्यवस्था की खामियों से है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि दिखावे में लाखों फूंकने वाले नेताओं के पास आग से तबाह परिवारों के लिए झोली खाली कैसे है।
रविवार को लगी आग ने मंझरिया गांव में सर्वाधिक तबाही मचाई थी। गांव के सौ परिवारों के सिर से छत छिन ली। एक बुजुर्ग की झुलसकर मौत हो गई। हादसे के बाद गांव पहुंचे नेताओं-अफसरों ने पीड़ितों के प्रति संवेदना जताते हुए भरपूर मदद का वादा तो जरूर किया, मगर तीन दिनों बाद भी जीने के लिए भोजन तक मुहैया कराने में नाकाम हैं।
गांव में घुसते ही बर्बादी की दास्तां साफ नजर आ रही है। सूजी आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने ढूंढे नहीं मिल रहे। हताश-निराश ग्रामीणों की पहली चिंता यही है कि कैसे भी सिर पर छत मिल जाए और परवरिश के लिए दो जून की रोटी।
गंवई राजनीति का दर्द भी पीड़ितों के चेहरे पर साफ नजर आ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि विरोधी खेमे का होने के कारण मदद के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं पूरी हुई हैं। हमें नहीं पता था कि ऐसे दिन आएंगे, वरना तभी तय कर लेते।