- पैकेट और दूध में मिलावट होने के कारण बच्चों की सेहत पर पड़ता है बुरा असर
-उल्टी दस्त के साथ डायरिया की चपेट में आते हैं बच्चे, दिखाते ही चिकित्सक पूछते हैं दूध पिलाने की हिस्ट्री
-अक्सर बाहर के दूध पिलाने के लिए करते हैं मना
सिद्धार्थनगर। अगर बच्चे को बाहर को दूध पिला रहे हैं तो सतर्क हो जाएं। उनके बार-बार बीमार पड़ने और डायरिया का शिकार होने की प्रमुख वजह दूध हो सकता है। बाजार के दूध में मिलावटी दूध धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। पाउडर वाले दूध भी असली है, इसकी गारंटी नहीं है। विशेषज्ञों की राय है कि दूध लेने से पहले उसे परख लें। ऐसा न करने पर आपका बच्चा धीरे-धीरे गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है।
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के साथ-साथ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पहुंचने वाले बच्चों की बीमारी के अहम वजह कहीं न कहीं बाहर का दूध ही पाया जा रहा है। चिकित्सक बाहर का दूध पिलाने को मना कर रहे हैं। वहीं, सफाई पर विशेष ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि मिलावट के साथ-साथ दूध की बाॅटल की सफाई और निपल के न बदले जाने से उसमें बैक्टिरिया तेजी से बढ़ते हैं जो पीने के बाद बच्चों को बीमार बना रहे हैं। छह माह तक के बच्चों को तो मां के दूध के अलावा कुछ भी नहीं देना चाहिए। तभी डायरिया सहित अन्य प्रकार की बीमारियों से उन्हें बचाया जा सकता है।
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हर दूसरा बच्चा पी रहा बाहर का दूध
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज बालरोग विभाग की ओपीडी में बड़ी संख्या में बीमार बच्चे पहुंच रहे हैं। इसमें अधिकांश बच्चे उल्टी दस्त और कमजोरी की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। सोमवार को भी बालरोग विभाग की ओपीडी में बड़ी संख्या में मरीज पहुंचे थे। इसमें जो छह माह से कम के बच्चे थे। उनमें दस्त के साथ दूध पिलाते ही उल्टी कर देने की शिकायत थी। डॉक्टर के दूध बाहर का पिलाने के सवाल पर सभी ने हामी भरी। डॉक्टरों ने इसके बाद सवाल किए कि दूध बाहर का पिलाते हैं तो बॉटल नियमित साफ करते हैं। निपल बदलते हैं। इस सवाल का जवाब अधिकांश बच्चों की मां के पास नहीं था। इसके बाद डॉक्टर बाहर का दूध पिलाने से मना करने के साथ- साथ बॉटल को नियमित साफ करने और निपल बदलने की सलाह के साथ दवाएं दीं। कई डॉक्टर ऐसे हैं, जहां प्रतिदिन 200 से अधिक बच्चों की ओपीडी हो रही है।
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बाजार के दूध की नहीं है गारंटी
दूध में मिलावट के अकसर मामले सामने आते हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम की जांच सैंपलिंग में पाउडर आदि मिलाए जाने और फैट कमी होने की पुष्टि हो चुकी है। इसमें हर माह जांच में गड़बड़ी की बात सामने आती है। इसमें जुर्माने के साथ-साथ केस दर्ज करने की कार्रवाई हाेती है। घर- घर बेचने वाले दूधिया में मिलावट की बात अधिक आती है। दूध का कारोबार करने वाले रामकेश ने बताया कि अगर 40 से 50 रुपये प्रति लीटर देने के बाद भी पशु पालक पानी मिलाकर देते हैं। आगे बेचने में कुछ रुपये मिल जाए, इसलिए कई बार पानी और पाउडर मिलाया जाता है, जिससे दूध गाढ़ा नजर आए। लेकिन, यह घर-घर बिक्री में ही खप पाता है। वहीं, पाउडर के दूध की बात करें तो शहर के एक मेडिकल स्टोर संचालक ने बताया कि इसमें कई ब्रांड के आते हैं। अकसर लोग कम दाम वाला लेते हैं। डिब्बे पर शुद्धता का दावा तो होता है पर अंदर की गारंटी कैसे ली जाती है। कई बार ऐसी शिकायत आती है कि बच्चे का पेशाब करने के बाद जगह पर सफेद धब्बा पड़ जाता है। इसके बारे में कंपनी को अवगत करवाया जाता है।
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बोले बच्चे के तीमारदार
मेडिकल कॉलेज में बच्चे को लेकर पहुंची शबाना ने बताया कि उसका बच्चा सात माह का है। दूध पिलाते ही उल्टी कर दे रहा है पेट भी नहीं रुक रहा है इसलिए बच्चा हमेशा रोता है। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने सलाह दी कि बच्चे को बाहर का दूध न पिलाएं, अगर पिलाते हैं तो बॉटल का जरूर साफ कर लें। साथ ही उन्होंने पिलाने के लिए दवा लिखी है।
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हमेशा सुस्त रहता है बच्चा
मेडिकल कॉलेज में ही बच्चे को दिखाने के लिए पहुंची राजिया ने बताया कि उनका बच्चा एक साल का हो गया है। लेकिन, वह हमेशा बीमार ही रहता है। हर 15 दिन पर उल्टी-दस्त का शिकार हो जाता है। बाहर का कुछ भी नहीं खाता है, केवल दूध पर रहता है। डॉक्टर में चावल दाल खिलाने की सलाह देने के साथ ही दवा दिया है। दूध बाटल के बजाय कचोरी चम्मच से पिलाने के लिए कहा है।
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स्वास्थ्य होने के बजाय बीमार बना रहा धूप
विशेषज्ञों के मुताबिक मिलावट के दूध में पौष्टिक तत्व की कमी हो जाती है। साथ ही यूरिया, सोडा जैसे रासायन मिलाने से उसका सेवन करने के बच्चे की सेहत अच्छी होने के बजाय और बिगड़ती है। जहां डायरिया के शिकार होते हैं। वहीं, हड्डी कमजोर, शरीर के अन्य अंग पर असर पड़ता है। विकसित होने के बजाय वह कुपोषित होने लगते हैं। ऐसे में यह दूध घातक हो जाते हैं।
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बोले विशेषज्ञ
इलाज के लिए आने वाले अधिकांश बच्चाें के बीमार होने के पीछे बाहर का दूध होना पाया जाता है। इसमें छह माह से कम उम्र के बच्चों में सबसे अधिक दिक्क्त पाई जा रही है। मां का दूध पिलाने के बजाय बाहर का वह भी बॉटल से पिलाया जाता है। इसकी वहज से बच्चा बीमार पड़ जाता है। डायरिया का शिकार हो जाता है। कमजोर पड़कर हमेशा रोता है। कारण धूप में बैक्टिरिया तेजी से पनपते हैं, जिसके पीने से बच्चा बीमार पड़ जाता है इसलिए सलाह दी जाती है कि छह माह तक के बच्चों को बाहर का दूध कतई न पिलाएं। मां का दूध बच्चे के लिए एंटी बैक्टिरिया है जो उसकी सेहत के लिए अनुकूल हैं। मां का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है।
- डॉ. नम्रता चौधरी, बालरोग विशेषज्ञ माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज