सिद्धार्थनगर। पीएम द्वारा दो अगस्त से शुरू हो रहे 100 दिवसीय नशा विरोधी अभियान की सिद्धार्थनगर में सबसे बड़ी चुनौती नशे की बदलती सप्लाई चेन होगी। भारत-नेपाल सीमा पर सख्ती के बाद तस्करों ने अपने रास्ते और नेटवर्क बदल लिए हैं।
पहले नेपाल से तस्करी कर सामान आता था, अब दूसरे राज्यों से शराब, गांजा और स्मैक की खेप जिले तक पहुंचाई जा रही है। ऐसे में अभियान की सफलता केवल बरामदगी के आंकड़ों से नहीं बल्कि अंतरराज्यीय नेटवर्क और स्थानीय सप्लाई चेन पर प्रभावी कार्रवाई से तय होगी।
भारत-नेपाल सीमा से सटा सिद्धार्थनगर लंबे समय तक नेपाल से होने वाली शराब, बीयर, गांजा और चरस की तस्करी के लिए संवेदनशील माना जाता रहा। एसएसबी, पुलिस और कस्टम की लगातार सख्ती के बाद सीमा पार से होने वाली तस्करी का स्वरूप बदला है।
अब हालिया मामलों में हरियाणा और अन्य राज्यों की शराब, उड़ीसा के नेटवर्क से गांजा और बाराबंकी से स्मैक की सप्लाई के मामले लगातार सामने आए हैं। वहीं, नशीले पदार्थ भारत से नेपाल ले जाने की कोशिश में तस्कर दबोचे गए हैं।
पुलिस आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में नशे के सेवन की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। शराब के बाद सबसे अधिक गांजे का इस्तेमाल होता है। सीमावर्ती इलाकों में स्मैक और हेरोइन की उपलब्धता समय-समय पर पुलिस कार्रवाई में सामने आती रही है। चरस की तस्करी की सूचनाएं मिलती रहती हैं लेकिन पिछले करीब डेढ़ वर्ष में इसकी कोई उल्लेखनीय बरामदगी नहीं हुई है।
एजेंसियों का मानना है कि अब बड़ी खेप के बजाय छोटे-छोटे कंसाइनमेंट के जरिये नशीले पदार्थ जिले तक पहुंचाए जा रहे हैं, जिससे तस्करी के नेटवर्क का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी लक्ष्मीनारायण कहते हैं कि दो अगस्त से शुरू होने वाले अभियान में पुलिस, एसएसबी, कस्टम और अन्य एजेंसियों का फोकस केवल सीमा पर निगरानी तक सीमित रहेगा तो परिणाम अच्छे नहीं मिलेंगे।
गिरोहों, स्थानीय सप्लायरों, आर्थिक नेटवर्क और सप्लाई चेन को तोड़ना होगा। नशे की मांग और सप्लाई, दोनों पर एक साथ चोट किए बिना परिणाम नहीं मिल पाएंगे।