सिद्धार्थनगर। नेपाल सीमा से सटे तराई क्षेत्र में जब सिद्धार्थ विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी, तब इसके पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य पिछड़े और सीमांत क्षेत्रों के युवाओं, विशेषकर बेटियों को उच्च शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना था। एक दशक बाद विश्वविद्यालय का 10वां दीक्षांत समारोह उस उद्देश्य की सफलता की गवाही देता नजर आ रहा है। इस बार दिए जाने वाले 37 स्वर्ण पदकों में 28 पदक छात्राओं के नाम हैं।
भगवान बुद्ध की तपोभूमि में स्थित सिद्धार्थ विश्वविद्यालय की स्थापना जून 2015 में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद के कपिलवस्तु में एक राज्य विश्वविद्यालय के रूप में की गई थी। वर्तमान में विश्वविद्यालय से छह जिलों (सिद्धार्थनगर, महराजगंज, संतकबीरनगर, बस्ती, श्रावस्ती और बलरामपुर) के संबद्ध 279 महाविद्यालयों के माध्यम से लगभग दो लाख विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्रदान कर रहा है।
मंडल के शिक्षाविदों का कहना है कि यह उपलब्धि केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता का आंकड़ा नहीं है बल्कि उस सामाजिक बदलाव का भी संकेत है, जिसकी उम्मीद विश्वविद्यालय की स्थापना के समय की गई थी। जिन क्षेत्रों में कभी उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित थी, वहां की बेटियां आज विश्वविद्यालय की मेधा सूची में सबसे आगे खड़ी हैं।
तराई और सीमावर्ती जिलों में लंबे समय तक उच्च शिक्षा के अवसर सीमित रहे। आर्थिक स्थिति, दूरी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में छात्राएं उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती थीं। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय और इससे संबद्ध महाविद्यालयों के विस्तार ने इस स्थिति में बदलाव लाने का काम किया। अब छात्राओं को घर के नजदीक ही स्नातक, परास्नातक और शोध स्तर तक पढ़ाई का अवसर मिल रहा है।
शिक्षकों का कहना है कि पिछले वर्षों में छात्राओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। इसका परिणाम अब स्वर्ण पदकों और शैक्षणिक उपलब्धियों के रूप में सामने आ रहा है। 37 में 28 स्वर्ण पदक छात्राओं को मिलना इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं।