डुमरियागंज क्षेत्र के हल्लौर में इमाम हजरत अली के शहादत दिवस पर आयोजित मजलिस को संबोधित करते म
-हल्लौर कस्बे में आयोजित हुई मर्सिया मजलिस, गूंजती रही हाय अली, हाय इमाम की सदा
संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। मौला- ए - कायनात हजरत इमाम अली की शहादत की याद में शनिवार को तहसील के शिया बाहुल्य कस्बा हल्लौर में मरसिया मजलिस हुई और अलम- ताबूत का जुलूस निकालकर अकीदतमंदों ने रोजा रखते हुए नौहा मातम कर हजरत अली को याद किया। इस दौरान हर तरफ अली-अली-हाय अली की सदाएं बुलंद होती रहीं। पूरा वातावरण गमगीन और शोकाकुल बना रहा।
इमाम हजरत अली अलैहिस्सलाम के शहादत पर 21 रमजान को हल्लौर स्थित शिया जामा मस्जिद में मरसिया मजलिस आयोजित हुई। इसमें मरसियाख्वानी हैदरे कर्रार और उनके सहयोगी ने की। मजलिस को मौलाना शाहकार हुसैन जैदी ने संबोधित करते हुए इमाम हजरत अली की शहादत बयां की। मजलिस के बाद जामा मस्जिद से अलम और ताबूत का मातमी जुलूस निकाला गया। जो बड़े इमामबाड़ा, दरगाह हजरत अब्बास, जन्नतुलबकी, सेठ बाबा का इमामबाड़ा, इमामबाड़ा हुसैनिया बाबुल और हुसैनिया बलागत और अली असगर अलैहिस्सलाम के रौजे तथा जनाबे सकीना के रौजे और हुसैनिया फहम तथा बारगाह सफायत हुसैन आदि स्थानों से होते हुए हल्लौर चौराहे पर बैक आफ बड़ौदा की शाखा के निकट पहुंचा। यहां हुई तकरीर में मौलाना शहकार हुसैन जैदी, मौलाना फिरोज हैदर तथा जाकिर जमाल हैदर और अजीम हैदर ने बताया कि खानाऐ काबा में 13 रजब को हजरत अली का जन्म हुआ था और 19 रमजान को कूफे में स्थित मस्जिद में सुबह की नमाज अदा करते वक्त अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम नाम के शख्स ने जहर में बुझी तलवार मौला अली के सिर पर मार कर जख्मी कर दिया। 21 रमजान की सुबह हजरत अली की शहादत हो गई।
मौलाना ने कहा कि ये गम 14 सदी के बाद भी आज तक हजरत अली के यौमे शहादत के रूप में दुनिया भर में मनाया जाता है। हजरत अली पूरी कायनात के मौला थे। उन्होंने हमेशा गरीबों, यतीमों और बेसहारा लोगों की दिल खोल कर मदद की। इसके बाद जुलूस बड़ा इमामबाड़ा के लिए रवाना हो गया।