सिद्धार्थनगर। पहले नियति ने रुलाया, अब जिम्मेदारों का उदासीन रवैया हिम्मत तोड़ रहा है। खातेदार कृषक दुर्घटना बीमा योजना का लाभ लेने के हकदार दर्जनों लोगों को इसका लाभ लेने में खून के आंसू रोना पड़ रहा है। आलम यह है कि 2004 सेे 2010 के बीच के 25 दावे अभी तक बीमा कंपनी के पास लटके हुए हैं। प्रशासन भी इन लोगों को उनका हक दिलाने के लिए महज रिमाइंडर भेज कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता नजर आ रहा है।
2004 में खेत का मालिकाना हक रखने वाले कृषक की आकस्मिक मृत्यु पर उन्हें मुआवजा देने के लिए इस योजना को शुरू किया था। उस वक्त किसान की आकस्मिक मृत्यु पर उसके परिवार को एक लाख रुपये देने का प्रावधान था। इस योजना में प्रदेश सरकार ने बीमा कंपनियों का सहारा लिया। बीमा कंपनियों को जिला प्रशासन की ओर से 90 दिन के भीतर मुआवजे के लिए दावे पेश किए जाने थे। इसके एक माह के भीतर पात्र लाभार्थी को योजना का लाभ दिए जाने का नियम तय हुआ। पर ऐसा हो नहीं सका। बीमा कंपनियों के अडंगे में फंसकर कई पात्र सरकारी दफ्तरों की खाक छान रहे हैं। भूलेख अधिकारी कार्यालय के आंकड़े बताते हैं कि 2004 से 2010 के बीच आए 25 दावे आज भी लंबित हैं। ये पात्र अपना हक पाने के लिए परेशान हैं। अब प्रदेश सरकार ने बीमा कंपनियों का सुस्त रवैया देखते हुए इस काम से उन्हें पूरी तरह से हटा दिया है। 2010 के बाद से अब तक प्रदेश सरकार स्वयं खातेदार कृषक दुर्घटना बीमा का संचालन कर रही है। साथ ही मुआवजे की राशि को भी उसने एक लाख से बढ़ाकर पांच लाख कर दिया है।
बजट ने लगाया ग्रहण
नए बदलाव के बाद भी योजना की हालत सुधरती नजर नहीं आ रही है। इस साल जनवरी से अब तक 161 दावे आए, इनमे से 56 दावे अब भी लटके हुए हैं। विभाग की माने तो इनके लटकने का कारण बजट का नहीं होना है।
वर्जन
बीमा कंपनियों से इस संबंध में पत्राचार किया जा रहा है। दावों के जल्द निस्तारण के लिए उन्हें कहा गया है। कुछ दावों में थोड़ी कमियां होने के कारण भी विलंब हुआ।
जगदीश, एडीएम सिद्धार्थनगर