डुमरियागंज। मृत्यु शाश्वत सत्य है लेकिन जब मौत को स्वीकार करने की बारी आती है तो हर कोई घबरा जाता है। मगर एक ऐसा गांव भी है जहां लोग मौत को खुदा का फरमान मान न केवल खुशी-खुशी कबूल करते हैं बल्कि जीते जी ही अपने अंतिम विदाई के सारे समान भी मंगवा लेते हैं। यहां कफन भेंट करना सबसे बड़ा तोहफा माना जाता है। करबला के कफन को पाक माना जाता है। इसलिए करबला से कफन खासतौर से मंगाए जाते हैं। मान्यता है कि इमाम हुसैन के रौजे से मस किया कफन पहन दफन होने वाले इंसान के गुनाह काफी हद तक कम हो जाते हैं।
डुमरियागंज तहसील से महज दो किलोमीटर बस्ती-बढ़नी मार्ग पर स्थित हल्लौर गांव अपने समृद्धिशाली संस्कृति के लिए मशहूर है। शिया बाहुल्य इस गांव के लोग मौत को अल्लाह का फरमान मान इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। यहां तक की कफन भी पहले ही मंगवा लेते हैं। करबला के कफन में दफन होना इस कौम में खास अकीदत मानी जाती है। इसलिए यहां लोग जियारत के लिए करबला जाने वाले अकीदतमंदों से कफन मंगवाते हैं। करबला से लौटने वाले लोग भी वहां शहीद इमाम हुसैन के रौजे से मस किया हुआ ढेर सारा कफन खरीद कर लेते आते हैं। इसे वे अपने नाते रिश्तेदारों को बडे़ ही शौक से बतौर तोहफा भेंट करते हैं। महिलाओं के लिए कफन के साथ-साथ दफन के दौरान लाश को पहनाए जाने वाले जेवर भी मौत के काफी पहले ही खरीद कर रख लिये जाते हैं। यह जेवर करबला की जमीं की मिट्टी से बने होते हैें। मौत के पहले दफन का सारा समान तैयार करने वालों को गांव में खुशनसीब माना जाता है। गांव के बुद्धिजीवी साहित्यकार सुल्तान अहमद रिज्वी कहते हैं कि अल्लाह का फरमान है कि हर किसी को एक न एक दिन मौत जरूर आनी है। यही कारण है कि यहां हर कोई मौत को अल्लाह का करम मान हमेशा तैयार रहता है। कौम के लोग मौत के पहले ही अपने दफन के सारे इंतजाम कर लेते हैं।
करबला का कफन भेंट करना खास महत्व रखता है। हल्लौर गांव के जमा मस्जिद के पेश इमाम वसीम रजा जैदी बताते हैं कि शियाओं के लिए हज के साथ करबला की जियारत करना भी जरूरी होता है। खासकर करबला के इमाम हुसैन के रौजे से मस किया हुआ कफन पहन कर दफन होना खुशनसीबी मानी जाती है। यही कारण है कि हल्लौर में लोग करबला का कफन पहले ही मांगा लेते हैं। कफन भेंट करना खास तोहफा माना जाता है।