बांसी। मोहर्रम कर्बला के शहीदों की यादगार है। यह वाकया आज से चौदह सौ साल पहले इराक देश के फरात नदी के किनारे एक निर्जन रेगिस्तान में हुआ था। जहां पैगंबर इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ भूखे प्यासे लड़कर मर जाना स्वीकार कर लिया। लेकिन अनैतिकता और अधर्म का समर्थन नहीं किया। मोहर्रम के कुछ प्रतीक चिह्न हैं।
मुहर्रम : अरबी वर्ष का पहला माह मुहर्रम है। इसी महीने की दस तारीख को पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नाती हजरत इमाम हुसैन और उनके परिजनों, साथियों को बहुत यातना देने के बाद यजीद की सेना ने शहीद कर दिया था। इस दिन को अरबी भाषा में अशरा कहते हैं, जिसे आम बोलचाल की भाषा में मोहर्रम की दसवीं कहा जाता है।
कर्बला : इराक देश के फरात नदी के किनारे जिस निर्जन रेगिस्तान में हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को शहीद किया गया था उस स्थान को कर्बला का मैदान कहा जाता है। बताया जाता है कि इस स्थान पर क्षेत्रीय प्रांत कूंफा के गर्वनर इबने जयाद ने इमाम हुसैन के काफिले को मोहर्रम की तीन तारीख को ठहरने को मजबूर कर दिया था। मोहर्रम की सात तारीख को फरात नदी का पानी रोक दिया था। इससे यह लोग बूंद-बूंद पानी को तरस गए। यह यातना इसलिए दी जा रही थी कि इमाम हुसैन वहां के शासक यजीद की बैयत यानी समर्थन कबूल कर लें।
इमामबाड़ा : यह विशेष प्रकार का भवन होता है। यहां ताजिया रखा जाता है। इसी भवन में इमाम हुसैन के साथ यजीदी सेना के किए गए जुल्म और अत्याचार का बखान और मातम हुआ था।
अलम : यह ध्वज पताका है। मोहर्रम के प्रतीक में एक यह भी है। यह एक विशेष प्रकार का हरा, लाल, काले रंग वाला झंडा होता है। मोहर्रम के जुलूस के साथ निकलता है। विभिन्न स्थानों पर मान्यता के अनुसार मोहर्रम की एक से दसवीं तारीख के बीच अलम का जुलूस निकलता है। कुछ स्थानों पर इमामबाड़ा और घरों में अलम (झंडा) लगाया जाता है।
दुलदुल या सवारी : यह पैगंबर इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब की सवारी जाक की यादगार है। जानकारों के अनुसार यह सवारी पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब से हजरत अली को फिर हजरत अली से हजरत इमाम हुसैन को मिली थी और कर्बला में हजरत इमाम हुसैन की सवारी यही थी। इसलिए मोहर्रम में अलग-अलग स्थानों पर मान्यताओं के अनुसार दुलदुल या सवारी निकाला जाता है।
मरसिया या नौहाखानी : मरसिया और नौहा दोनों उर्दू की दो विधाएं हैं। इन दोनों का अर्थ शोक व्यक्त करने और विलाप करने से है। इसलिए मोहर्रम के दिनों में लोग मरसिया और नौहाखानी कर कर्बला के मैदान में शहीद हुए इमाम हुसैन और उनके परिजनों की याद में शोक व्यक्त कर विलाप करते हैं।
सबील : यह विशेष प्रकार शरबत होता है, जो इमाम चौक पर आने वाले लोगों को मिल जाता है। कर्बला के मैदान में फरात नदी का पानी रोककर यजीदी सेना हजरत इमाम हुसैन के काफिले को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसाई थी। इसलिए मोहर्रम के दिनों में लोगों को सबील का शरबत दिया जाता है। अब कोई मोहर्रम के दिनों में प्यासा न रह जाए।
ताजिया : इमाम हुसैन के मजार के शक्ल का बांस और लकड़ी पर रंग बिरंगा कागज लगाकर ताजिया बनाया जाता है, जिसे मोहर्रम की 9वीं की शाम को इमाम चौकों पर बैठाया जाता है। फिर दसवीं को गश्त कराकर प्रतीकात्मक कर्बला के मैदान में दफन कर दिया जाता है।