सिद्धार्थनगर। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने दावा किया है कि अगस्त में तो इंसेफेलाइटिस से मौतें होती ही हैं, वहीं मुख्यमंत्री ने गंदगी को इंसेफेलाइटिस का सबसे बड़ा कारण बताया है। इतना जानने के बाद भी सरकारी महकमे ने इंसेफेलाइटिस प्रभावित क्षेत्रों में बचाव और सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया है। अगस्त के 14 दिन बीत चुके हैं, बावजूद जिले के इंसेफेलाइटिस प्रभावित इलाके बदहाली से जूझ रहे हैं। कहीं, भीषण गंदगी का अंबार लगा है तो कहीं सुअर आबादी के बीच घूम रहे हैं। इंसेफेलाइटिस प्रभावित क्षेत्रों में किसी भी स्तर पर बचाव और सुरक्षा का कोई काम नहीं हुआ है। बारिश के बाद स्थिति और भयावह हो चुकी है, मगर जिले के जिम्मेदार चैन की नींद सो रहे हैं। एक-दूसरे पर जिम्मेदारियां थोपते उनके बयानों से जाहिर है कि पूर्वांचल के लिए अभिशाप बन चुकी इस बीमारी को लेकर सरकारी महकमा कितना गंभीर है।
शुरुआत नगर के कृष्णानगर वार्ड से करते हैं। रेलवे लाइन से सटे इस मोहल्ले में जून 2012 में नितेश श्रीवास्तव (16) की इंसेफेलाइटिस से मौत हुई थी। यह वार्ड उन क्षेत्रों में शामिल है, जो इंसेफेलाइटिस के डेंजर जोन में चिह्नित हैं। वार्ड का ताजा हाल बुरा है। कूड़े-कचरे का अंबार लगा हुआ है। रेलवे लाइन के बगल से निकला नाला गंदगी से पटा है। नाले के चारों तरफ सुअर घूमते हैं। सुअर को इंसेफेलाइटिस का सबसे प्रमुख वाहक माना जाता है। यहां लगे दो इंडिया मार्का हैंडपंप भी खराब बताए गए। वार्डवासी बाबूलाल का कहना था कि जलनिगम को कई बार पत्र दिया गया, लेकिन सुधार नहीं हो रहा।
पुनीत श्रीवास्तव ने बताया कि नगर पालिका से शिकायत करते थक चुके हैं, कोई फर्क नहीं पड़ रहा। माधुरी ने बताया कि शुक्रवार की रात ही तीन बच्चों की अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। बुखार होने से भय बढ़ गया था। हालांकि वायरल होने के चलते निजी अस्पताल में उपचार से थोड़ी राहत मिल गई। वार्ड वासी व्यवस्था से बुरी तरह खिन्न हैं। उनका कहना है कि पहले तो सभासद से शिकायत भी कर लेते थे, लेकिन कार्यकाल खत्म होने के बाद स्थिति और बुरी हो गई है। यह अगस्त का महीना है, बावजूद जिम्मेदार नहीं जाग रहे। कमोवेश यही हाल इंसेफेलाइटिस प्रभावित बेलहिया चौराहा, जगदीशपुर, मधुकरपुर, सनई, साड़ी ग्राम पंचायतों की भी है। सिसवां बुजुर्ग गांव में इंसेफेलाइटिस से करीब छह वर्ष पूर्व अश्वनी त्रिपाठी की मौत हुई थी। वर्ष 2014 में यहां दो लड़कियों में इंसेफेलाइटिस पाया गया था। यहां भी बचाव और सुरक्षा का इंतजाम नहीं है।
अब तक आए 19 मरीज, एक की मौत
सिद्धार्थनगर। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें जिला अस्पताल में इस वर्ष अब तक 19 मामले इंसेफेलाइटिस के आए हैं। इनमें 6 मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया है, जबकि एक की मौत हुई है। वर्ष 2016 में भर्ती मरीजों की संख्या 60 व मृतकों की 4 थी। यह आंकड़े सिर्फ जिला अस्पताल के हैं। पीएचसी-सीएचसी से भी बड़ी संख्या में मरीजों को सीधे मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है।
बोले सीएमओ: हम तो नए हैं, ले रहे हैं सूचना
इंसेफेलाइटिस पर प्रभावी रोकथाम के लिए नोडल संस्था स्वास्थ्य विभाग के सीएमओ डॉ.रतन कुमार का कहना है कि अभी जिले में आए चंद दिन ही हुए हैं। सूचनाएं ली जा रही हैं। वैसे सभी पीएचसी-सीएचसी में इंसेफेलाइटिस की रोकथाम के लिए इंतजाम किए जा चुके हैं। डॉक्टरों को ट्रेनिंग दे दी गई है। अलग वार्ड स्थापित किया गया है। इंसेफेलाइटिस प्रभावित क्षेत्रों में शासन की मंशानुरूप सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। प्रभावित क्षेत्रों में नगर पालिका व स्थानीय प्रशासन से वार्ता कर सामूहिक कार्रवाई की जाएगी।
आबादी से बाहर नहीं हुए सुअरबाड़े
सिद्धार्थनगर। इंसेफेलाइटिस वायरस का सबसे प्रमुख वाहक सुअर होता है। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए ही सुअरबाड़ों को आबादी से बाहर स्थापित कराने के निर्देश दिया गया था। कई बार यह निर्देश जारी हुए, लेकिन कोई बदलाव नहीं हुआ। करीब 50 से अधिक सुअरबाड़े आबादी के बीच संचालित हो रहे हैं। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ.फणीश सिंह का कहना है कि सुअरबाड़ों को आबादी से बाहर विस्थापित किया जाना है, मगर कैसे करें। संचालक जाने को तैयार नहीं। ग्राम प्रधान भी जगह नहीं दे रहे। फोर्स की मौजूदगी में यह संभव है, मगर प्रशासन का अपेक्षित सहयोग नहीं मिला है। अपने स्तर से पूरी कोशिश कर रहे हैं।
जोगिया में मिली थी इंसेफेलाइटिस वायरस की सूचना, अब तक पुष्टि नहीं
मई माह में पशु पालन विभाग ने जोगिया क्षेत्र में संचालित एक सुअरबाड़े से सुअर का सेंपल लेकर जांच को भेजा था। विभागीय सूत्रों के मुताबिक एक नमूने में इंसेफेलाइटिस वायरस होने की पुष्टि भी हुई थी। मौखिक सूचना दी गई, लेकिन अब तक रिपोर्ट की अधिकृत प्रति नहीं आई है। पत्र न आने से विभाग कोई कदम भी नहीं उठा पा रहा। उनका मानना है कि मौखिक रूप से कोई भ्रामक सूचना भी दे सकता है। लिहाजा अधिकृत पत्र का इंतजार है। सूचना आए दो माह बीतने को है, लेकिन इंसेफेलाइटिस के वाहक बने सुअर अभी भी जीवित हाल में यहां घूम रहे हैं।