सिद्धार्थनगर। 1898 में ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लॉस्टन पेपे की देखरेख में हुई खोदाई के दौरान पिपरहवा स्तूप से बुद्धकालीन अवशेष प्राप्त हुए थे।
इस खोदाई में लगभग 20 फीट नीचे से 700 किलोग्राम वजन वाला एक पत्थर का बॉक्स मिला था, जिसमें लगभग 1800 अवशेष पाए गए थे। जिन्हें पिपरहवा रत्न कहा गया। इनमें से कुछ रत्न विलियम पेपे को प्रदान किए गए, जिन्हें वह इंग्लैंड ले गए थे। सात मई को इन्हीं रत्नों को पेपे के वंशज हांगकांग में नीलाम करने की तैयारी में थे। पेपे की चौथी पीढ़ी ने इन पुरावशेषों को हांगकांग में सोथबी नाम की एजेंसी के माध्यम से सात मई को नीलाम करने की योजना बनाई थी। इतिहासकारों के अनुसार बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पिपरहवा बेहद महत्वपूर्ण है। सिद्धार्थनगर जिले के लिए 2500 वर्ष पुराने यह अवशेष एक ऐतिहासिक पहचान की तरह है। सोथबी की वेबसाइट पर पिपरहवा से जुड़े बुद्धकालीन अवशेषों को नीलाम की जाने की जानकारी पर सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी ने नीलामी रुकवाने और अवशेषों को वापस लाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी और सीएम मोदी समेत अन्य को भी पत्र लिखा था। अमर उजाला ने इस मामले को प्रमुखता से उठाते हुए अभियान चलाया था। अब केंद्र सरकार की पहल पर अवशेष भारत वापस ले आए गए हैं।
प्रोफेसर व राजनीतिज्ञों ने लिखा था पत्र : असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी व अन्य प्रोफेसरों के साथ ही नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद, राज्य सभा सदस्य बृजलाल, डीएम डॉ. राजागणपति आर. समेत बौद्ध अनुयायियों ने भी नीलामी रोकने के लिए पत्र भेजा था। उन्होंने प्रधानमंत्री, विदेश व संस्कृति मंत्रालय समेत अन्य को पत्र भेज कर नीलामी रोकवाने और पिपरहवा रत्न की वापसी के लिए आग्रह किया था।